मेरी मेरी करताँ जनम गयौ, जनम गयौ पर हरि न कह्यौ॥ टेक॥बारह बरस बालापन खोयौ, बीस बरस कछु तप न कयौ।तीन बरस कै राम न सुमिरौं, फिरि पछितानौं बिरध भयो॥आयौ चोर तुरंग मुसि ले गयौ, मोरी राखत मगध फिरै॥सीस चरन कर कंपन लागै, नैन नीर अस राल बहै।जिभ्या बचन सूध नहीं निकसै, तब सुकरित की बात कहै॥कहै कबीर सुनहु रे संतौ धन संच्यो कछु संगि न गयौ।आई तलब गोपाल राइ की, मैंडी मंदिर छाड़ि चल्यौ॥243॥

मेरी मेरी करताँ जनम गयौ, जनम गयौ पर हरि न कह्यौ
कबीरपद · लगभग २ मिनट