गुण के गाहक सहस नर, बिनु गुण लहै न कोय।जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।दोऊको यक रंग, काग सब भये अपावन॥कह गिरिधर कबिराय सुनो हो ठाकुर मन के।बिनु गुण लहै न कोई सहस नर गाहक गुण के॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+