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राम राम, राम राम, राम राम, जपत

पद · लगभग २ मिनट
राम राम, राम राम, राम राम, जपत।मंगल-मुद उदित होत, कलि-मल-छल छपत ॥ १ ॥कहु के लहे फल रसाल, बबुर बीज बपत।हाहरि जनि जनम जाय गाल गूल गपत ॥ २ ॥काल, करम, गुन, सुभाउ सबके सीस तपत।राम-नाम-महिमाकी चरचा चले चपत ॥ ३ ॥साधन बिनु सिद्धि सकल बिकल लोग लपत।कलिजुग बर बनिज बिपुल, नाम-नगर खपत ॥ ४ ॥नाम सों प्रतीति-प्रीति हृदय सुथिर थपत।पावन किये रावन-रिपु तुलसिहु-से अपत ॥ ५ ॥

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