राम राम राम रमि रहिए, साषित सेती भूलि न कहिये॥ टेक॥का सुनहाँ कौ सुमृत सुनायें, का साषित पै हरि गुन गाँये।का कऊवा कौं कपूर खवाँयें, का बिसहर कौं दूध पिलाँयें।साषित सुनहाँ दोऊ भाई, वो नींदे कौ भौंकत जाई।अंमृत ले ले नींब स्यँचाई, कत कबीर बाकी बाँनि न जाई॥221॥

