हंस सुता तट बिहरिबो, करि वृंदावन बास।कुंज केलि मृदु मधुर रस, प्रेम बिलास उपास॥प्रेम बिलास उपास, रहै इक रस मन मांही।तेहि सुख को सुख कहा, कहौं मेरी मति नाहीं॥हित ध्रुव यह रस अति सरस, रसिकन कियो प्रशंस।मुकतन छांड़ै चुगत नहिं, मानसरोवर हंस॥

हंस सुता तट बिहरिबो
ध्रुवदासकुंडली · लगभग २ मिनट