ऐसे हिय में बसत रहौ, नवल किशोर रस रासि।चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि॥करत मंद मृदु हाँसि, दोउ होत जु प्रेम प्रकास।छके रहत मदमत्त गति, आनंद मदन बिलास॥हित ध्रुव छबि सों कुंज में, दै अंशनि भुज घैसे।मेरी मत इति नाहिं कहौं, उपमा दै ऐसे॥

ऐसे हिय में बसत रहौ
ध्रुवदासकुंडली · लगभग २ मिनट