अब मोहि ले चलि नणद के बीर, अपने देसा।इन पंचनि मिलि लूटी हूँ, कुसंग आहि बदेसा॥ टेक॥गंग तीर मोरी खेती बारी, जमुन तीर खरिहानाँ।सातौं बिरही मेरे निपजैं, पंचूँ मोर किसानाँ॥कहै कबीर यह अकथ कथा है, कहताँ कही न जाई।सहज भाइ जिहिं ऊपजै, ते रमि रहै समाई॥14॥

अब मोहि ले चलि नणद के बीर, अपने देसा
कबीरपद · लगभग २ मिनट