ऐसो हौंहुँ जानति भृंग!नाहिनै काहूँ लह्यो सुख प्रीति करि इक अंग ।। 1 ।।कौन भीर जो नीरदहि, जेहि लागि रटत बिहंग।मीन जल बिनु तलफि तनु तजै, सलिल सहज असंग ।। 2 ।।पीर कछू न मनिहि, जाकें बिरह बिकल भुअंग।ब्याध बिसिख बिलोक नहिं कलगान लुबुध कुरंग ।। 3 ।।स्यामघन गुनबरि छबिमनि मुरलि तान तरंग।लग्यो मन बहु भाँति तुलसी होइ क्यों रसभंग? ।। 4 ।।

