अब तोहि जान न देहुँ राम पियारे, ज्यूँ भावै त्यूँ होहु हमारे॥ टेक॥बहुत दिनन के बिछुरे हरि पाये, भाग बड़े घरि बैठे आये॥चरननि लागि करौं बरियायी, प्रेम प्रीति राखौं उरझाई।इत मन मंदिर रहौ नित चोषै, कहै कबीर करहु मति घोषैं॥3॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+