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झूलै कुँवरि गोपराइन की

पद · लगभग २ मिनट
झूलै कुँवरि गोपराइन की। मधि राधा सुंदरि-सुकुमारि॥प्रथमहि रितु पावस आरम्भ। श्रीवृषभानु मँगाये खंभ॥काढ़ि भवन ते रतन अमोल। पटि-पचि-रुचिर रचाइ हिंडोल॥एक-तें एक सुभग सुकुमारि। रचा मनीं बिधि कुंकुम नारि॥जगमगाति नव जोबन-जोति। निरखि नैन चकचौंधी होति॥बरन-बरन चूनरी सुरंग। फबी सलौने सोने-अंग॥राजत मनि-अभरन रमनीय। गुही जुही कबरी कमनीय॥गवाहिं सुघर सरस रसगीत। दुलरावैं मन मोहन मीत॥प्रेम-बिबस भई सकहिं न गाइ। उपज्यौ आनंद उर न समाइ॥दुरि देखत गोकुल-कुलराइ। सोभा निरखत मन न अघाइ॥मुदित ‘गदाधर’ नंदकिसोर। लोचन भये भरे के चोर॥

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