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माधवजू, मोसम मंद न कोऊ

पद · लगभग २ मिनट
माधवजू, मोसम मंद न कोऊ।जद्यपि मीन-पतंग हीनमति, मोहि नहिं पूजैं ओऊ ॥ १ ॥रुचिर रुप-आहार-बस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो।देखत बिपति बिषय न तजत हौं, ताते अधिक अयान्यो ॥ २ ॥महामोह-सरिता अपार महँ, संतत फिरत बह्यो।श्रीहरि- चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥ ३ ॥अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति ज्यौं भरि मुख पकरै।निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥ ४ ॥परम कठिन भव-ब्याल-ग्रसित भयो अति भारी।चाहत अभय भेक सरनागत, खगपति-नाथ बिसारी ॥ ५ ॥जलचर-बृंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा।एकहि एक खात लालच-बस, नहिं देखत निज नासा ॥ ६ ॥मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावै।तुलसिदास पतित-पावन प्रभु यह भरोस जिय आवै ॥ ७ ॥

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