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हाशिया
कविता
भेष फ़क़ीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ
मलूकदास
दोहा · लगभग २ मिनट
भेष फ़क़ीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ।
दिल फ़क़ीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ॥
॥
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जहाँ-जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ-तहाँ फिरे गाय
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देवल पुजे कि देवता, की पूजे पहाड़
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