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निरमल निरमल राम गुण गावै, सौ भगता मेरे मनि भावै

पद · लगभग २ मिनट
निरमल निरमल राम गुण गावै, सौ भगता मेरे मनि भावै॥ टेक॥जे जन लेहिं राम नाँउँ, ताकी मैं बलिहारी जाँउँ॥जिहि घटि राम रहे भरपूरि, ताकी मैं चरनन की धूरि॥जाति जुलाहा मति कौ धीर, हरषि हरषि गुँण रमैं कबीर॥124॥

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