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जा नरि राम भगति नहीं साथी, सो जनमत काहे न मूवौ अपराथी

पद · लगभग २ मिनट
जा नरि राम भगति नहीं साथी, सो जनमत काहे न मूवौ अपराथी॥ टेक॥गरभ मूचे मुचि भई किन बाँझ, सकर रूप फिरै कलि माँझ।जिहि कुलि पुत्र न ग्याँन बिचारी, बाकी विधवा काहे न भई महतारी।कहै कबीर नर सुंदर सरूप, राम भगत बिन कुचल करूप॥125॥

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