जा नरि राम भगति नहीं साथी, सो जनमत काहे न मूवौ अपराथी॥ टेक॥गरभ मूचे मुचि भई किन बाँझ, सकर रूप फिरै कलि माँझ।जिहि कुलि पुत्र न ग्याँन बिचारी, बाकी विधवा काहे न भई महतारी।कहै कबीर नर सुंदर सरूप, राम भगत बिन कुचल करूप॥125॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीरकवितास्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीर२ मिनट का पाठ