राम बिनाँ धिग्र धिग्र नर नारी, कहा तैं आइ कियौ संसारी॥ टेक॥रज बिना कैसो रजपूत, ग्यान बिना फोकट अवधूत॥गनिका कौ पूत कासौ कहैं, गुर बिन चेला ग्यान न लहै॥कबीर कन्याँ करै स्यंगार, सोभ न पावै बिन भरतार॥कहै कबीर हूँ कहता डरूँ, सुषदेव कहै तो मैं क्या करौं॥126॥

