जरि जाव ऐसा जीवनाँ, राजा राम सूँ प्रीति न होई।जन्म अमोलिक जात है, चेति न देखै कोई॥ टेक॥मधुमाषी धन संग्रहै, यधुवा मधु ले जाई रे।गयौ गयौ धन मूँढ़ जनाँ, फिरि पीछैं पछिताई रे॥विषिया सुख कै कारनै, जाइ गानिका सूँ प्रीति लगाई रे।अंधै आगि न सूझई, पढ़ि पढ़ि लोग बुझाई रे॥एक जनम कै कारणैं, कत पूजौ देव सहँसौ रे।काहे न पूजौ राम जी, जाकौ भगत महेसौ रे॥कहै कबीर चित चंचला, सुनहू मूढ़ मति मोरी।विषिय फिर फिर आवई, राजा राम न मिले बहोरी॥127॥

