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सति राम सतगुर की सेवा, पूजहु राम निरंजन देवा

पद · लगभग २ मिनट
सति राम सतगुर की सेवा, पूजहु राम निरंजन देवा॥ टेक॥जल कै मंजन्य जो गति होई, मीनां नित ही न्हावै।जैसा मींनां तैसा नरा, फिरि फिरि जोनी आवै॥मन मैं मैला तीर्थ न्हावै, तिनि बैकुंठ न जांना।पाखंङ करि करि जगत भुलांनां, नांहिन राम अयांनां॥हिरदे कठोर मरै बनारसि, नरक न बंच्या जाई।हरि कौ दास मरै जे मगहरि, सेन्यां सकल तिराई॥पाठ पुरान बेद नहीं सुमिरत, तहाँ बसै निरकारा।कहै कबीर एक ही ध्यावो, बावलिया संसारा॥345॥

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