ऐसा ज्ञान बिचारि रे मनां, हरि किन सुमिरै दुख भंजना॥ टेक॥जब लग मैं में मेरी करै, तब लग काज एक नहीं सरै।जब यहु मैं मेरी मिटि जाइ, तब हरि काज सँवारै आइ।जब स्यंध रहै बन मांहि, तब लग यहु बन फूलै नांहि।उलटि स्याल स्यंध कूँ खाइ, तब यहु फूलै सब बनराई॥जीत्या डूबै हार्या तिरै, गुर प्रसाद जीवत ही मरै।दास कबीर कहै समझाइ, केवल राम रहौ ल्यो लाइ॥349॥

