नर मरै नर काम न आवै। पशु मरैदस काज संवारे॥अपने कर्म की गति मैं क्या जानी। मैं क्या जानौ बाबा रे॥हाड़ जले जैसे लकड़ी का तूला। केस जले जैसे घास का पूला॥कहत कबीर तबही नर जागै। जम का डंड मुँड़ महि लागै॥122॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीरकवितासासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीर२ मिनट का पाठ
हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीरकविताहिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीर२ मिनट का पाठ