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चोरी रही मन में ठगोरी रूप ही में रही

कवित्त · लगभग २ मिनट
चोरी रही मन में ठगोरी रूप ही में रही नाहीं तौ रही है एक मानिनी के मान में।केस में कुटिलताई नैन में चपलताई भौंह में बँकाई हीनताई कटियान में।भूषन भनत पातसाही पातसाहन में, तेरे सिवराज राज अदल जहान में।कुच मे कठोरताई रति में निलजताई छाँड़ि सब ठौर रही आइ अबलान में॥

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