सुवा एक दाड़िम के धोके, गयो नारियल खान।कछु खायो कछु खा न पायो, फिर लागो पछितान॥फिर लागो पछितान, बुद्धि अपनी को रोवा।निर्गुणियन के साथ बैठि, अपने गुन खोआ।कह गिरिधर कविराय, सुनो रे मोरे नोखे।गयो झटाका टूटि, चोंच दाड़िम के धोखे॥

सुवा एक दाड़िम के धोके
गिरिधर कविरायकुंडलियाँ · लगभग २ मिनट