परम चतुर सुन्दर सुख सागर तन को प्रिय प्रतिहार।रूप-लकुटरोके रहतो, सखि! अनुदिन नंदकुमार॥अब ता बिनु उर-भवन भयो है सिव-रिपु को संचार।दुख आवत मन, हटक न मानत, सूनो देखि अगार॥असुस-उसासजात अँतर तें करत न सकुच बिचार॥निसा निमेष-कपाट लगे बिनु ससि सत सत सर मार॥यह गति मेरी भई है हरि बिनु नाहिं कछू परिहार।सूरदास प्रभु बेगि मिलहु तुम नागर नँदकुमार॥३२१॥

