प्रेम-तृषा की ताप ‘ध्रुव’, कैसेहुँ कही न जात।रूप-नीर छिरकत रहैं, तऊँ न नैन अघात॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सखीनी की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरेध्रुवदासकवितासखीनी की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरेध्रुवदास२ मिनट का पाठ