मधुकर! ये सुनु तन मन कारे।कहूं न सेत सिद्धताई तन परसे हैं अँग कारे॥कीन्हो कपट कुंभ विषपूरन पयमुख प्रगट उघारे।बाहिर बेष मनोहर दरसत, अन्तरगत जु ठगारे॥अब तुम चले ज्ञान-बिष दै हरन जु प्रान हमारे।ते क्यों भले होहिं सूरप्रभु रूप, बचन, कृत कारे॥२७३॥

मधुकर! ये सुनु तन मन कारे
सूरदासपद · लगभग २ मिनट