भैया हो! अबहु छाक नहीं आई।भाई अबेर भूख लागी है, काहै बेर लगाई॥देखौ तौ मारग में सब मिलि, कौन ही आज पठाई।भूलि परी है किधों बिपिन में, पेंड़ें नाहिं चलाई॥किधों हमारे प्रेम बिबस तन, वा पै चल्यौ न जाई।किधों गोपाल लेत बोलति है, गदगद सुरन सुहाई॥रहे गोपाल अकेले जब-तब, ग्वालिन निकट बुलाई।आलिंगन दै अधर महारस, सीस छाक है पाई।‘रसिक प्रीतम’ कौ मधुर नाद सुनि, ग्वाल मंडली धाई॥

भैया हो! अबहु छाक नहीं आई
गोस्वामी हरिरायपद · लगभग २ मिनट