तबतें और न कछु सुहाई।सुंदर स्याम जबहि तैं देखे खरिक दुहावत गांइ॥आवति हुती चली मारग सखि! हौं अपने सतभाई।मदन गोपाल देखिके इकटक रही ठगी मुरझाइ॥बिसरी लोक-लाज गृह-कारज बंधु पिता अरु माइ।दास चतुर्भुज प्रभु गिरिधर तनु-मनु लियौ चुराइ॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+