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हाशिया
कविता
कहु रहीम उत जायकै, गिरिधारी सों टेरि
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
कहु रहीम उत जायकै, गिरिधारी सों टेरि।
राधे दृग-जल-झरन ते, अब ब्रज बूड़त फेरि॥२९॥
॥
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कहि रहीम सम्पति सगे, बनत बहुत बहु रीति
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कहु रहीम केतिक रही, केती गई बिहाइ
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ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों
रहीम
कविता
ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों
रहीम
२ मिनट का पाठ
सुनि धुनि कान मुरलिआ, रागन-भेद
रहीम
कविता
सुनि धुनि कान मुरलिआ, रागन-भेद
रहीम
२ मिनट का पाठ
रहिमन जग की रीति, मैं देखा रस ऊख मैं
रहीम
कविता
रहिमन जग की रीति, मैं देखा रस ऊख मैं
रहीम
२ मिनट का पाठ