तृन-सम जब है जाहिं, प्रभुता, सुख त्रैलोक के।यह आवै मन माहिं, उपजै रंचक प्रेम तब॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सखीनी की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरेध्रुवदासकवितासखीनी की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरेध्रुवदास२ मिनट का पाठ
प्रीतम की प्रेम गति देखै भूली तन गतिध्रुवदासकविताप्रीतम की प्रेम गति देखै भूली तन गतिध्रुवदास२ मिनट का पाठ