मेरी सूचीपढ़ना शुरू करें

सोभा केहि बिधि बरनि सुनाऊँ

पद · लगभग २ मिनट
सोभा केहि बिधि बरनि सुनाऊँ।इक रसना, सोउ लोचन-हानी, कहौ पार क्यों पाऊँ॥अंग-अग लावन्य-माधुरी, बुधि-बल किती बताऊँ।अतुलित सुनति कहि गये क्यों, दृग पल रजि धरि जू उचाऊँ॥नव वय-संधि दुहुनि नित उलहत, जब देखौ तब औरे।यहि कौतुक मेरी सुनि सजनी, चित न रहत इक ठौरे॥लोक न सुनी दृग नहिं देखी, ऐसी रूप निकाई।मेरी तेरी कहा चलो, खग-मृग-मति प्रेम बिकाई॥कबहूँ गौर स्याम तन कबहूँ लोचन प्यासे धावैं।कह घटि जात सिंध कौ, पंक्षी जो चोंचन भरि लावैं॥सुन्दरता की हद मुरलीधर, बेहद छबि श्रीराधा।गावैं बपु अनंत धरि सारद, तऊँ न पूजै साधा॥न्याइ काम करवट ह्वै निकसत, पिय अरु रूप गुमानी।वृंदावन हितरूप कियों बस, सो कानन की रानी॥

अब कुछ और पढ़ें