अधखिला फूल
समर्पण · समर्पण — अगला पाठ
हम यथासामर्थ्य चारों आपत्तियों की अयौक्तिकता सिद्ध कर चुके, साथ ही उस आशंका का भी निरसन हुआ, जो कि आपत्तियों के उत्थापन का कारण थी, सम्भव है कि इस विषय में भाषा मर्मज्ञों की कुछ और सम्मति हो, किन्तु अब मुझको कुछ वक्तव्य नहीं है।
इतना लिखने के पश्चात् भी यदि उन शब्दों के विषय में किसी महाशय को विशेष तर्क-वितर्क होवे, तो मेरी प्रार्थना यह है कि वे गम्भीर गवेषणा से काम लें, उस समय उनको ऊमस, अनोखा, सजीला का व्यवहार हिन्दी को कौन कहे उर्दू गद्य में भी मिलेगा। नेह, बयार, निहोरा, छबीली, बापुरे, सरबस, निबारती आदि का प्रयोग भी वे लब्ध प्रतिष्ठत हिन्दी-लेखकों के गद्य ग्रन्थों में पावेंगे। हाँ! नेरे, घनेरे, चेरे शब्दों का प्रयोग उनको शायद ही गद्य ग्रन्थों में मिलेगा। मैंने भी उनको गद्य में स्थान नहीं दिया है, ये शब्द पद्य में ही आये हैं। गद्य से पद्य में सर्वत्र कुछ स्वतन्त्रता होती है। मैं ग्रन्थों से वाक्यों को उध्दृत करके अपने कथन की पुष्टि भी करता, किन्तु इस विषय में ऊपर विस्तृत लेख लिखने के पश्चात् मैंने व्यर्थ इस भूमिका के कलेवर की वृध्दि उत्तम नहीं समझा।
जो कुछ मैंने अभी कतिपय पंक्तियों में लिखा है, यदि पहले ही मैं इसको लिख देता, तो इस विषय में विस्तृत लेख लिखने की आवश्यकता न होती। क्योंकि जब लब्धप्रतिष्ठत लेखकों द्वारा उनका व्यवहार सिद्ध है, तो फिर तर्क को स्थान कहाँ रहा। किन्तु ऐसी दशा में किसी सिद्धान्त पर उपनीत होना कठिन होता, और इसीलिए मुझको विस्तृत लेख लिखना पड़ा।
इस अवसर पर और एक विषय की मीमांसा आवश्यक है, वह यह है कि जस, अपजस, विपत, इत्यादि शब्द जो अशुद्ध रूप में व्यवहृत हुए हैं, क्या यह प्रणाली ठीक है? शब्दों को तोड़-मरोड़ कर रखने की अपेक्षा उनका शुद्ध रूप में व्यवहार करना क्या उत्तम नहीं है? जहाँ तक मैं समझता हूँ, कह सकता हूँ कि व्यवहार में पड़कर जो टेढ़े-मेढ़े शब्द-प्रस्तर-समूह घिसते-घिसते सुन्दर और सुडौल आकार में परिणत हो गये हैं फिर उनको उसी पूर्व रूप में लाने की चेष्टा व्यर्थ है। आजकल की हिन्दी भाषा में शुद्ध संस्कृत शब्द अधिकतर व्यवहृत होते हैं, और प्राय: धुरंधर लेखकों की चेष्टा शुद्ध संस्कृत शब्द-समूह व्यवहार करने की ओर अधिक देखी जाती है-किन्तु शुद्ध संस्कृत शब्दों के स्थान पर व्यवहृत अपभ्रंश संस्कृत शब्दों का प्रयोग मैं उससे उत्तम समझता हूँ। आँख, नाक, कान, मुँह, दूध, दही के स्थान पर लिखने के समय हम इनका शुद्ध रूप अक्ष, नासिका, कर्ण, मुख, दुग्ध, दधि इत्यादि व्यवहार कर सकते हैं, किन्तु भाषा इससे कर्कश हो जावेगी, जन-साधारण की बोधगम्य न होगी। साथ ही उसका हिन्दीपन लोप हो जावेगा। किसी भाषा के लिखने की चेष्टा करने पर यथासाध्य उसको उन्हीं शब्दों में लिखना चाहिए, जिनमें कि वह बोली जाती होवे-अन्यथा वह उन्नत कदापि न होगी। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि लिखित भाषा और कथित भाषा में सर्वदा कुछ-न-कुछ अन्तर अवश्य हुआ करता है-परन्तु यह अन्तर इतना न होना चाहिए जिससे कि आप उसके रूप पहचानने में भी कुण्ठित होवें।
यदि कोई वादग्रस्त विषय लिखना होवे, किम्वा कोई गूढ़ मीमांसा करनी हो, अथवा मनोभावव्यंजक कोई उपपुक्त शब्द भाषा में न प्राप्त होता होवे-तो हम संस्कृत शब्दों से हिन्दी लिखने के समय अवश्य काम ले सकते हैं-ऐसी अवस्था में हमको कोई दोष भागी भी न बनावेगा। किन्तु यदि हम कोई साधारण बात लिखना चाहते हैं, और भाषा के भण्डार से हमको आवश्यकतानुसार शब्द प्राप्त हो सकते हैं, और हम फिर भी संस्कृत शब्दों की तृष्णा नहीं त्यागते, और दौड़ कर भाषा के चिकने कोमल शब्दों को संस्कृत का पूर्वरूप देने का ही आग्रह करते हैं, तो अवश्य हम दोषभागी हैं।
यदि यह कहा जावे कि ‘’आँख नाक, कान इत्यादि जो अपभ्रंश संस्कृत शब्द हैं, वे वास्तव में जन-साधारण द्वारा ऐसे ही बोले जाते हैं, अतएव उनको शुद्ध करके लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। जस इत्यादि को इसलिए शुद्धरूप में लिखने को कहा जाता है कि वास्तव में उनका जन-साधारण में इस रूप में व्यवहार नहीं है, यह सब सर्वथा बने हुए और कल्पित अवगत होते हैं।’’ तो हम कहेंगे कि यदि यह विचार सत्य है, तो हमको भी कोई विरोध नहीं है, मैं भी उसी रूप में शब्द के व्यवहार का पक्षपाती हूँ कि जिस रूप में वह सर्वसाधारण द्वारा बोला जाता है, यदि सर्वसाधारण द्वारा वह उस रूप में नहीं बोला जाता है कि जिस रूप में वह लिखा गया है तो अवश्य त्याज्य है। किन्तु वक्तव्य यह है कि क्या यह विचार सत्य है? क्या सर्वसाधारण जस को यश अपजस को अपयश और विपत को विपत्ति बोलते हैं? कदापि नहीं, वरन उन का उच्चारण वही है, जैसा कि लिखा गया है। उच्चारण के विषय में इन शब्दों पर आक्षेप कदापि नहीं हो सकता। हाँ, यह कहा जा सकता है कि इस रूप में किसी ग्रन्थ में ये शब्द नहीं लिखे गये, परन्तु मैं इस बात को भी नहीं मान सकता। उर्दू में बराबर यश के स्थान पर जस का व्यवहार होता है। कविता में अनेक स्थानों पर अपयश के स्थान पर अपजस का प्रयोग हुआ है, सर्व साधारण में वह बोला भी इसी रूप में जाता है, विपत के विषय में भी वही कहा जा सकता है।
मैं उच्चारण को आदर्श मान कर, यत:कार्य करने का पूर्ण पक्षपाती हूँ, अतएव मैंने अपने अनुभव पर निर्भर करके उक्त दोनों ग्रन्थों में प्राय: शुद्ध संस्कृत शब्दों के स्थान पर बोलचाल में व्यवहृत अपभ्रंश संस्कृत शब्दों के व्यवहार की चेष्टा की है, और उन को उसी आकार और रूप में लिखा है कि जिस आकार और रूप में व्यवहृत होते हैं। या यों समझिये ठेठ हिन्दी में ग्रन्थ लिखने के लिए कटिबद्ध होकर मुझको विवशतानिबन्धन ऐसा करना पड़ा है। किन्तु मेरा यह पक्षपात सर्वथा निर्दोष है या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। मैंने ऐसे शब्दों के व्यवहार की पुष्टि भी की है। परन्तु इस पुष्टि से मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि किसी पुस्तक में इस प्रकार के किसी शब्द के प्रयोग मिलने पर ही उस शब्द का उस प्रकार हमको प्रयोग करना चाहिए। सिद्धान्त की बात तो यह है कि प्रत्येक लेखक को इस प्रकार का प्रयोग करने का अधिकार है। किन्तु उस अवस्था में जब कि वह निश्चय कर लेवे कि उस शब्द का व्यवहार सर्वसाधारण में उसी प्रकार होता है।
स्मरण रहे कि यह प्रयोग ‘देखो’ के ‘द्यखो’ लिखने के समान नहीं है, कारण इसका यह है कि देखो का व्यवहार अधिकतर प्रान्तों में इसी रूप में होता है-हिन्दी और उर्दू के सुलेखकों ने भी इसको इसी रूप में लिखा है-अतएव इन बातों पर दृष्टि देकर इसका इसी रूप में लिखा जाना सुसंगत है। किसी एक प्रान्त के उच्चारण का आग्रह कर के उस को ‘द्धखो’ लिखना ऐसा ही अनुचित है, जैसा सर्वसम्मत और भाषापरिगृहीत ‘नाक’ शब्द के स्थान पर किसी प्रान्तविशेष के उच्चारण का आग्रह करके ‘नकुरा’ लिखना असंगत है।
इस ढंग से शब्दप्रयोग करते प्राचीन हिन्दी लेखकों को भी देखा जाता है, प्रमाण में मैं बाबू हरिश्चन्द्र के सत्य हरिश्चन्द्र नाटक से एक पैरा नीचे उद्धृत करता हूँ। इस पैरे में जिन शब्दों के नीचे आड़ी लकीर है, वे सब शब्द ध्यान देने योग्य हैं।
‘’हाय! यह बिपत का समुद्र कहाँ से उमड़ पड़ा, अरे! छलिया मुझे छल कर कहाँ भाग गया! (देखकर) अरे आयुस की रेखा तो इतनी लम्बी है फिर अभी से यह बज्र कहाँ से टूट पड़ा। अरे ऐसा सुन्दर मुँह, बड़ी-बड़ी आँख, लम्बी-लम्बी भुजा, चौड़ी छाती, गुलाब सा रंग। हाय! मरने के तुझमें कौन से लच्छन थे, जो भगवान ने तुझे मार डाला! हाय! लाल! अरे बड़े-बड़े जोतसी गुनी लोग तो कहते थे कि तुम्हारा बेटा बड़ा प्रतापी चक्रवर्ती राजा होगा, बहुत दिन जीवेगा, सो सब झूठ निकला! हाय! पोथी, पत्र, पूजा, पाठ, दान, जप, होम, कुछ भी काम न आया! हाय! तुम्हारे बाप का कठिन पुन्न भी तुम्हारा सहाय न भया और तुम चल बसे! हाय!’’
शैब्याबिलाप।
जैसे ब्रजभाषा शब्दों के व्यवहार के विषय में लोगों ने तर्क किये, उसी प्रकार कई महाशयों ने कतिपय शब्दों के स्त्रीलिंग और पुल्लिंग होने के विषय में भी वाद किया। इनमें मुख्य शब्द, उमंग, चाल चलन, और चर्चा हैं। मैं इन शब्दों के विषय में भी कुछ लिखना चाहता हूँ। लिंगविभेद का झगड़ा बहुत दिनों से उर्दू और हिन्दी दोनों भाषाओं में चला आता है। उर्दू ही में कुछ लोग एक शब्द को पुल्लिंग और दूसरे स्त्रीलिंग लिखते हैं। लखनवी और देहलवी उर्दू को मिलाकर देखिए उस समय आप को मेरे कथन के कितने ही प्रमाण मिलेंगे। हिन्दी भाषा में भी देखा जाता है कि बाबू हरिश्चन्द्र और उनके परवर्ती लेखकों के अनुसरण करनेवाले तो पुस्तक और आत्मा को स्त्रीलिंग लिखते हैं और पण्डितऊ हिन्दी लिखनेवाले इन्हीं शब्दों को पुल्लिंग लिखते हैं। ऐसा ही विभेद आप वायु और पवन शब्द में देखेंगे, इन शब्दों को कोई पुल्लिंग लिखता है, और कोई स्त्रीलिंग। ऐसे ही और शब्द भी बतलाये जा सकते हैं। किन्तु इस विवाद को छोड़कर मुझे वादग्रस्त शब्दों की ही मीमांसा करना है, अतएव मैं इसी कार्य में प्रवृत्त होता हूँ।
पहले मैं उमंग शब्द को लेता हूँ-और देखता हूँ कि हिन्दी भाषा के सुलेखकों ने इसको स्त्रीलिंग लिखा है वा पुल्लिंग। सबसे प्रथम मैं बाबू हरिश्चन्द्र के ग्रन्थ से ही प्रमाण उद्धृत करता हँ। उनके कर्पूरमंजरी सट्टक के पृष्ठ 23 में यह वाक्य है-
‘’राजा-परस्पर सहज स्नेह अनुराग के उमंगों का बढ़ना अनेक रसों का अनुभव, संयोग का विशेष सुख, संगीत साहित्य और सुख की सामग्री मात्र को सुहावना कर देना, और स्वर्ग का पृथ्वी पर अनुभव करना।’’
बाबू राधाकृष्ण दास हिन्दी के वर्तमान सुलेखकों में हैं, बाबू हरिश्चन्द्र की जीवनी के पृष्ठ 16 में लिखते हैं-
‘’बाबू हरिश्चन्द्र के बाल्यकाल ही में इन के पूजनीय पिता ने परलोक प्राप्त किया। लोगों ने इनके उमंग का अच्छा अवसर उपस्थित देख उन्हें राय रत्नचन्द बहादुर से लड़ा दिया।’’
कविवर भिखारी दास भाषा के प्रसिद्ध कवियों में हैं, उनके शृंगारनिर्णय के पृष्ठ 39 में यह सवैया लिखी हुई है-
सवैया
समीप निकुंजन कुंजबिहारी गये लखि साँझ पगे रसरंग।
इतै बहु द्योस मैं आय कै धाय नवेली को बैठी लगाइ उछंग।
उड़ी तहँ दास बसी चिड़ियाँ उड़िगो तिय को चित वाहि के संग।
बिछोह तें बुंद गिरे ऍंसुआँ के सुवाके गुने गये प्रेम-उमंग।1।
हिन्दी-कोष के पृष्ठ 30 में यह शब्द अर्थ के साथ इस प्रकार लिखा हुआ है, कोष्ठगत ‘प’ से उसी ग्रन्थ के आदि पृष्ठ की सूचना के अनुसार पुल्लिंग समझना चाहिए।
उमंग (प) मग्नता, धुन, तृष्णा।
ऊपर जो प्रमाण संग्रह किये गये, उन से स्पष्ट है कि हिन्दी में ‘उमंग’ शब्द को पुल्लिंग लिखते हैं।
अब कुछ उर्दू के शायरों की कविता नीचे लिखता हूँ, पाठकगण देखें, इस में ‘उमंग’ शब्द का व्यवहार ‘स्त्रीलिंग’ की भाँति हुआ है।
अकबर- साम्हने थीं लेडियाने माह वश जादू नजर।
यां जवानी की उमंग वो उनको आशिक की तलाश।
नैरंग- सहरा को खींचती है दिलेजार की उमंग।
बैठा रहे जो घर में यह किसको करार है।
अब चालचलन को देखिए।
सुप्रसिद्ध भारतमित्र पत्र के वर्तमान सम्पादक बाबू बालमुकुन्द गुप्त हिन्दी और उर्दू दोनों पर समान अधिकार रखते हैं, अतएव इन्हीं का लेख हिन्दी के विषय में प्रमाणस्वरूप यहाँ उद्धृत किया जाता है, क्योंकि केवल हिन्दी जाननेवाले की अपेक्षा हिन्दी और उर्दू दोनों जाननेवाले का लेख विशेष पुष्टि का हेतु होगा-
‘’जज्ज-अगर तुम नहीं मानोगे तो मैं सरकार में तुम्हारी चालचलन की रिपोर्ट करूँगा।’’
एक दूसरी ठौर-
‘’अगर एक जिलाजज्ज एक बारिष्टर को गाली दे तो बारिष्टर जज्ज की चालचलन पर रिमार्क कर सकता है।
भारतमित्र 4 जून सन् 1904 ई. कालम चौथा पंक्ति 80, 81, वो 115, 116-
मोलवी हसन अली साहब मुहम्मद मिशनरी अपने नेकचलनी नामक प्रबन्ध में लिखते हैं।
‘’गो इन्सान पूरी लियाकत न रखता हो, और दौलत में भी कम हो, लेकिन अगर उसका चालचलन उम्दा और शाइस्ता है, तो उसकी कदर और मंजिश्लत हमेशा बढ़ती रहेगी’’-
मुअल्लिमुत्ताहजशब पृष्ठ 72।
सर सैयद अहमद साहब ‘अपनी मदद आप’ शीर्षक प्रबन्ध के आठवें टुकड़े में लिखते हैं-
‘’लौर्ड बेकन का निहायत उम्दा कौल है-कि इल्म से अमल नहीं आता, इल्म को अमल में लाना इल्म से बाहर को इल्म से बरतर है, इल्म की निस्बत अमल और सवानेह उमरी की निस्बत उम्दा चालचलन आदमी को ज्यादा जश्जश् और काबिल अदब बनाता है’’-
मुअल्लिमुत्तहजीब, पृष्ठ 91
ऊपर जो वाक्य उद्धृत किये गये, उनके देखने से पाया जाता है कि हिन्दीवाले चालचलन को स्त्रीलिंग लिखते हैं-किन्तु उर्दू वाले इसी शब्द का प्रयोग पुल्ंलिग की तरह करते हैं।
अब चर्चा की चर्चा हमें और करनी है। सबसे पहले भारतेन्दु जी की एक सवैया हम नीचे लिखते हैं।
सवैया
जग जानत कौन है प्रेमबिथा केहि सों चरचा या वियोग की कीजिए।
पुनि को कही मानै कही समझे कोऊ क्यों बिन बात की रारहिं लीजिए।
नित जो हरिचंद जू बीतै सहैं बकि कै जग क्यों परतीतहि छीजिए।
सब पूछत मौन क्यों बैठि रही पिय प्यारे कहा इनै उत्तर दीजिए।
सुन्दरीतिलक, पृष्ठ 226 में यह सवैया लिखी है।
सवैया
पी चलिबे की चली चरचा सुनि चंद्रमुखी चितई दृगकोरन।
पीरी परी तुरतै मुख पै बिलखी बनि व्याकुल मैन सकोरन।
को बरजै अलि कासों कहौं मन झूलत नेह ज्यों लाज झकोरन।
मोती से पोइ रहे ऍंसुआ न गिरे न फिरे वरुनीन के कोरन।
उर्दू कवियों की भी दो कविताएँ देखिए-
अकबर- अकबर से आज हजरते वायज़ ने यों कहा।
चरचा है जा बजा तेरे हाले तबाह का।
कश्चित- दुनियें के जो मजे हैं हरगिज यह कम न होंगे।
चरचा यही रहेगा अफसोस हम न होंगे।
ऊपर की कविताओं के देखने से स्पष्ट है कि भाषा में चर्चा को स्त्रीलिंग लिखते हैं और उर्दू वाले उसको पुंल्लिंग बाँधते हैं।
अब यहाँ उलझन यह आन पड़ी कि जब भाषा और उर्दू लिखनेवालों के प्रयोग में इस प्रकार प्रभेद है-तो इन शब्दों के स्त्रीलिंग पुंल्लिंग की मीमांसा कैसे हो। वास्तव बात यह है कि इस प्रकार के शब्दों के लिंग की मीमांसा बहुत कठिन है। ऐसे अवसर पर हमारा कर्तव्य यही है कि जब हम भाषा लिखें तो ऐसे शब्दों के प्रयोग के विषय में भाषावालों का मार्ग ग्रहण करें, और जब उर्दू लिखें तो उर्दू वालों का। अन्यथा हमारा लेख पुल्लिंग, स्त्रीलिंग के दोष से मुक्त न हो सकेगा।
यह हम स्वीकार करेंगे कि भाषा लिखनेवालों में भी कोई-कोई उर्दूवालों के समान चालचलन को पुल्लिंग लिखते हैं, परन्तु अल्प। अधिकतर भाषा लिखनेवाले प्राचीन हिन्दी लेखकों का ही अनुसरण करते हैं। हाँ, उमंग की बात निराली है, भाषा-गद्य-पद्य लिखनेवालों में भी अधिक लोग इसको स्त्रीलिंग ही लिखते हैं। बाबू हरिश्चन्द्र ने चन्द्रावली नाटिका पृष्ठ 25 में इस को स्त्रीलिंग लिखा है-स्वर्गीय पं. प्रतापनारायण मिश्र इसको सदा स्त्रीलिंग ही लिखते थे। अतएव यदि व्यवहार के आधिक्य पर विचार किया जावे तो यह अवश्य कहना पड़ेगा कि इस शब्द का स्त्रीलिंग लिखा जाना ही अच्छा है। इसी प्रकार आधिक्य पर दृष्टि डालकर उन शब्दों की मीमांसा कर लेनी चाहिए, कि जो भाषा में भी दो प्रकार से लिखे जाते हैं-अर्थात् भाषा ही में जिनको कोई स्त्रीलिंग और कोई पुल्लिंग लिखता है।
वास्तव बात यह है कि शब्दों का स्त्रीलिंग और पुल्लिंग लिखा जाना और किसी वाक्य का ठीक-ठीक लिपिबद्ध होना समाज के बोलचाल पर निर्भर करता है। व्याकरण भी बोलचाल के अनुसार ही विधिबद्ध होता है, अर्थात् बोलचाल की विधिबद्ध प्रणाली ही व्याकरण है। अतएव समाज द्वारा जो शब्द जिस प्रकार काम में लाया जाता है, अथवा जो वाक्य जिस प्रकार व्यवहृत होता है, उसको उसी प्रकार काम में लाना और व्यवहार करना चाहिए।
दो-चार शब्दों के विषय में मुझको कुछ बातें और कहनी हैं, उनको कहकर अब मैं इस लेख को समाप्त करूँगा।
‘अधखिला फूल’ के पृष्ठ 89 पंक्ति में 9 में ‘पतोहें’ और पृष्ठ 110 पंक्ति 20 में देवतों, और पृष्ठ 129 पंक्ति 10 में बिपतों, शब्द का प्रयोग हुआ है। व्याकरणानुसार इन शब्दों का शुद्ध रूप, पतोहुएँ, देवताओं, और बिपत्तियों, होता है। अतएव यहाँ पर प्रश्न हो सकता है, कि इन शुद्ध रूपों के स्थान पर, पतोहें इत्यादि अशुद्ध रूप क्यों लिखे गये? बात यह है कि पतोहू और बिपत्ति शब्द का बहुवचन व्याकरणानुसार अवश्य पतोहुएँ, और बिपत्तियाँ होगा, परन्तु सर्वसाधारण बोलचाल में पतोहू के स्थान पर पतोह और बिपत्ति के स्थान पर बिपत शब्द का प्रयोग करते हैं, अतएव व्याकरणानुसार इन दोनों शब्दों का बहुवचन पतोहें, और बिपतों किम्बा बिपतें यथास्थान होगा। इसके अतिरिक्त उच्चारण की सुविधा, कारण, अब पतोहुएँ और बिपत्तियों के स्थान पर पतोहें व बिपतों शब्दों का ही सर्वसाधारण में प्रचार है, इसलिए पतोहुएँ और बिपत्तियों के स्थान पर पतोहें और बिपतों लिखा जाना ही सुसंगत है। हाँ देवतों शब्द किसी प्रकार व्याकरणानुसार सिद्ध न होगा, क्योंकि देवता शब्द का बहुवचन जब होगा तो देवताओं ही होगा। अतएव इस शब्द के विषय में अशुद्ध प्रयोग का दोष अवश्य लग सकता है। परन्तु स्मरण रहे कि व्याकरणानुसार यद्यपि देवतों पद असिद्ध है तथापि सर्वसाधारण की बोलचाल में देवताओं शब्द नहीं है, देवता का बहुवचन उन लोगों के द्वारा देवतों ही व्यवहृत होता है, और समाज की बोलचाल को सदा व्याकरण पर प्रधानता है, अतएव देवताओं के स्थान पर देवतों पद का ही प्रयोग किया गया है। किन्तु यदि इसमें मेरा दुराग्रह समझा जावे तो देवतों शब्द के स्थान पर देवताओं शब्द ही पढ़ा जावे, इस विषय में मुझको विशेष तर्क वितर्क नहीं है।
पतोहें, और बिपतों, किम्वा विपतें इत्यादि के समान पहले से भी प्रयोग होता आया है, आप लोग बाबू हरिश्चन्द्र के निम्नलिखित पद के उन शब्दों पर ध्यान दीजिए, जिनके नीचे आड़ी लकीर दी हुई हैं। उन शब्दों का बहुवचन रीतियाँ, नीतियाँ, प्रीतियाँ, व्याकरणानुसार होना चाहिए, परन्तु उनका उच्चारण रीत, नीत, प्रीत समझकर बहुवचन रीतैं, नीतैं, प्रीतैं बनाया गया है।
पद
कुढ़त हम देखि देखि तुब रीतैं।
सब पै इक सी दया न राखत नई निकाली नीतैं।
अजामील पापी पर कीनी जौन कृपा करि प्रीतैं।
सो हरिचन्द हमारी बारी कहाँ बिसारी जी तैं।
ठेठ हिन्दी का ठाठ, के बहुत प्रचार के साथ उसकी भाषा के विषय में लोगों की अनेक तर्कनायें भी हुईं, समय-समय पर श्रवण परंपरा से मुझको उनका ज्ञान होता रहा, परन्तु जब नागरी प्रचारिणी सभा के सभा-भवन-उत्सव पर मैं काशी गया तो वहाँ कई एक सज्जनों से इस विषय में विशेष बातचीत हुई। मेरे भक्तिमान कनिष्ठ सहोदर पं. गुरुसेवक सिंह उपाध्याय बी.ए. डिप्टी कलक्टर मिर्जापुर ने जब इस ग्रन्थ की एक-एक प्रति महामहोपाधयाय पं. सुधाकर द्विवेदी इत्यादि सुजनों को अर्पण की थी, तो उन लोगों ने भी इस विषय में कई एक बातें कही थीं। निदान जो-जो तर्क वितर्क ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’ की भाषा के विषय में आज तक हुए हैं, मैंने यथासामर्थ्य उन सबका उत्तर इस भूमिका में लिख दिया है। किन्तु मेरा उत्तर सुसंगत हैं या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। इसका विचार भाषा मर्मज्ञों के हाथ है। मुझको इस बात का खेद है कि मेरी इच्छा के विरुद्ध भूमिका बहुत विस्तृत हो गयी, किन्तु क्या करूँ, प्रसंगवश मुझको अनेक विषयों की अवतारणा करनी पड़ी-आशा है आप लोग विवश समझ कर क्षमा करेंगे।
मैंने इस ‘अधखिला फूल’ को भी ठेठ हिन्दी में ही लिखा है, और यथासामर्थ्य किसी अन्य भाषा के शब्द न आने देने की चेष्टा की है, ऐसा कई ठौर लिखा जा चुका है किन्तु इस पौने दो सौ पृष्ठ की पुस्तक में अनवधनता अथवा भ्रमवश भी अन्य भाषा का कोई शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है-यह मैं नहीं कह सकता। यदि ऐसी त्रुटि कहीं दृष्टिगोचर होवे, तो मैं अपने सहृदय पाठक से उसकी मार्जना और उससे अभिज्ञताप्रदान की प्रार्थना करता हूँ। किन्तु विनय यह है कि जवान और बच्चा इत्यादि शब्दों पर गम्भीर गवेषणा पूर्वक दृष्टि डाली जावे, क्योंकि यद्यपि ये शब्द फारसी ज्ञात होते हैं किन्तु वास्तव में ये संस्कृत शब्द युवन् और वत्स के अपभ्रंश हैं।
एक विषय में मैं बहुत लज्जित हूँ-और वह इस भूमिका की भाषा है। इस भूमिका में बहुत से संस्कृत शब्दों का प्रयोग करके मैं गोस्वामी तुलसीदासजी के इस वाक्य का कि ‘पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।’ स्वयं आदर्श बन गया हूँ। किन्तु क्या करूँ एक तो जटिल विषयों की मीमांसा करनी थी, दूसरे यह भूमिका बहुत शीघ्रता में लिखी गयी है, अतएव उक्त दोष से मैं मुक्त न हो सका। यदि परमात्मा सानुकूल है तो आगे को इस विषय में सफलता लाभ करने की चेष्टा करूँगा।
