ग्रामीण जीवन, प्रेम, आत्मसम्मान और बदलते सामाजिक संबंधों के बीच तितली और मधुबन की कथा।
विषय सूची
- १प्रथम खंड !
- २२ — १
- ३३ — १
- ४४ — १
- ५५ — १
- ६६ — १
- ७द्वितीय खंड
- ८२ — २
- ९३ — २
- १०५ — २
- ११६ — २
- १२७ — १
- १३८ — १
- १४अध्याय १४
- १५अध्याय १५
- १६तृतीय खंड
- १७२ — ३
- १८३ — ३
- १९४ — २
- २०५ — ३
- २१६ — ३
- २२७ — २
- २३८ — २
- २४दूसरा दृश्य, अंधकार में और भी मलिन, कलुषपूर्ण हृदय की भूमिका में अत्यंत विकृति होकर प्रतिभासित हो उठा। शेरकोट-खंडहर, उसमें भीतरी यह लिपी-पुती चूने से चमकीली एक छोटी-सी कोठरी ! और राजो बन ठनकर बैठी है। क्यों ? किवाड़ बंद है। भीतर ही वह शीशे में अपना रूप देख रही है। बाहर किवाड़ों पर खट-खट का शब्द होता है। वह मुस्कुराकर उठ खड़ी होती है।
- २५चतुर्थ खंड
- २६२ — ४
- २७३ — ४
- २८४ — ३
- २९५ — ४

