तितली
६ — ३
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मधुबन गहरे नशे से चौंक उठा था। हत्या ! मैंने क्या कर दिया ? फांसी की टिकठी का चित्र उसके कालिमापूर्ण आकाश में चारों ओर अग्निरेखा में स्पष्ट हो उठा। इमली के घने वृक्षों की छाया में अपने ही श्वासों से सिहरकर सोचता हुआ वह भाग रहा था।
तो, क्या वह मर गया होगा ? नहीं-मैंने तो उसका गला ही घोंट दिया है। गला घोंटने से मूर्च्छित हो गया होगा। चैतन्य हो जाएगा अवश्य ?
थोड़ा-सा उसके हृदय की धड़कन को विश्राम मिला। वह अब भी बाजार के पीछे-पीछे अपनी भयभीत अवस्था में सशंक चल रहा था। महंत की निकली हुई आंखें जैसे उसकी आंखों में घुसने लगीं। विकल होकर वह अपनी आंखों को मूंदकर चलने लगा, उसने कहा-नहीं, मैं तो वहाँ गया भी नहीं। किसने मुझको देखा ? राजो ! हत्यारिन ! ओह उसी की बुलाई हुई यह विपत्ति है। यह देखो, इस वयस में उसका उत्पात ! हाँ, मार डाला है मैंने, इसका दंड दूसरा नहीं हो सकता। काट डालना ही ठीक था। तो फिर मैंने किया क्या, हत्या ? नहीं ! और किया भी हो तो बुरा क्या किया।
उसके सामने महंत की निकली हुई आंखों का चित्र नाचने लगा। फिर-तितली का निष्पाप और भोला-सा मुखड़ा। हाय-हाय। मधुबन ! तूने क्या किया ! वह क्या करेगी ? कौन उसकी रक्षा करेगा ?
उसका गला भर आया। वह चलता जाता था और भीतर ही भीतर अपने रोने को, सांसों को, दबाता जाता था। उसे दूर से किसी के दौड़ने का और ललकारने का भ्रम हुआ। अरे पकड़ा गया तो …।
क्षण-भर के लिए रुका। उसने पहचाना, यह तो मैना के घर के पीछे की फुलवारी की पक्की दीवार है। तो छिप जाए। यहीं न, अच्छा अब तो सोचने का समय नहीं है। लो, वह सब आ गए।
छोटी-सी दीवार फांदते उसको क्या देर लगती। मैना की फुलवारी में अंधकार था 1 उसके कमरे की खिड़की की संधि से आलोक की पहली रेखा निकलकर उस विराट अंधकार में निष्प्रभ हो जाती थी।
मधुबन सिरस से ऊपर चढ़ी हुई मालती की छाया में ठिठक गया। पीछा करने वालों की आहट लेने लगा। किंतु मेरा भ्रम है। अभी कोई नहीं आया। उसने साहस भरे हृदय से विश्वास किया, यह सब मेरा भ्रम है। अभी कोई नहीं आया और न जानता है कि मैं कहाँ हूँ। तो यह मैना का घर है। कोई दूसरा भी तो यहाँ आ सकता है। कौन जाने वह किसी के साथ उस कोठरी में सुख लुटाती हो। वैश्या …रुपए की पुजारिन ! है तो … मेरे पास भी।
उसने अपनी थैली पर हाथ रखा। फिर महंत की आंखें उसके सामने आ गई। धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं। ओह ! कितनी बड़ी उनसे छिपकर वह बच नहीं सकता। समूचा आकाश केवल महंत की आंख बनकर उसके सामने खड़ा था।
मधुबन ने आंख बंद करके अपना सिर एक बार दोनों हाथों से दबाया। उसने कहा-तो भय क्या ! फांसी ही न पाऊंगा फिर इस समय तो, अच्छा देखूं कोई है तो नहीं।
वह धीरे-धीरे बिल्ली के-से दबे पांवों से मैना की खिड़की के पास गया। संधि में से भीतर का सब दृश्य दिखाई दे रहा था। आंगन में भीतर खुलने वाला किवाड़ बंद था। खिड़की से लगा हुआ मैना का पलंग था। वह लालटेन के उजाले में कोई पुस्तक पढ़ रही थी। मधुबन को विश्वास न हुआ कि वह अकेली ही है। उसने धीरे से खिड़की के पल्लों को खोला। मैना ध्यान से पढ़ रही थी। उसने फिर पल्लों को हटाया। अब मैना ने घूमकर देखा।
वह चिल्लाना ही चाहती थी कि मधुबन की अंगुली मुँह पर जा पड़ी। चुप रहने का संकेत पाकर वह उठ खड़ी हुई। धीरे से किवाड़ खोला। उसने चकित होकर मधुबन का उस रात में जाना देखा। वह संदेह, प्रसन्नता और आश्चर्य चकित हो रही थी।
मधुबन ने भीतर आकर किवाड़ बंद कर दिया। मैना सोच रही थी-मधुबन बाबू सबसे छिपकर मुझ बेश्या के यहाँ इस एकांत रजनी में अभिसार करने आए हैं ! उसने न जाने क्यों विरक्ति सी हुई। उसने मधुबन को पलंग पर बैठाते हुए कहा-भला इधर से आने की ….
उसके मुँह पर हाथ रखकर मधुबन ने कहा चुप रहो। पहले यह बताओ कि तुम्हारे यहाँ इस समय कौन-कौन है। यहाँ कोई हम लोगों की बात सुनता तो नहीं है ?
वह मुस्कुराने लगी। वेश्या के यहाँ आने में इतने भयभीत। क्यों? यहाँ तो कोई नहीं सुन सकता ! मां और निद्धू तो आंगन के उस पार सड़क वाले कमरे में हैं। रधिया सोई होगी। वह तो संध्या से ही ऊंघने लगती है। इधर तो मैं ही हूँ। फिर इतना डर काहे का। कुछ चोरी तो नहीं कर रहे हैं। एक रात मेरे घर रहने से बहू रूठ न जाएगी। मैं…
मधुबन ने फिर उसकी चुप रहने का संकेत किया। मैना ने देखा कि मधुबन का मुँह विवर्ण और भयभीत है। उसने मधुबन के शरीरसे सटकर पूछा-बात क्या है ?
मधुबन का हाथ अपने कमर में बंधी थैली पर जा पड़ा। ओह ! हत्या का प्रमाण तो उसी के पास है। उसने धीरे से उसे कमर से खोल कर पलंग पर रख दिया। थैली का रंग लाल था। उसे देखते-ही-देखते मधुबन की आंखें चढ़ गई।
मैना ने देखा कि मधुबन उन्मत्त सा हो गया है। उसे झिंझोड़कर उसने हिला दिया, क्योंकि मधुबन का वह रुप देखकर मैना को भी भय लगा। उसने पूछा-क्यों बोलते नहीं ?
मधुबन को सहसा चेतना हुई। उसने धीरे-से थैली खोलकर उसमें सी गिन्नियां और रुपए पलंग पर रख दिए। मैना को तो चकाचौंध-सी लग गई।
मधुबन ने धीरे-से लैंप की चिमनी उतारकर उसकी लौ से थैली लगा दी। वह भक-भक करके जल उठी।
अब तो मैना से न रहा गया। उसने मधुबन का हाथ पकड़कर कहा-तुम कुछ न कहोगे तो मैं मां को बुलाती हूँ। मुझे डर लग रहा है।
मैंने खून किया है- मधुबन ने अविचल भाव से कहा।
बाप रे ! यह क्यों ? मुझे रुपए देने के लिए ?
मैना का श्वास रुकने लगा। उसने फिर संभलकर कहा-मैं तो बिना रुपए की तुम्हारी ही थी। यह भला तुमने क्या किया ?
जो करना था कर दिया। अब बताओ, तुम मुझे यहाँ छिपा सकती हो कि नहीं ? मैं कल यहाँ से जाऊंगा। रात भर में मुझे जो कुछ करना है, उसे सोच लूंगा। बोलो !
मधुबन बाबू ! प्राण देकर भी आपकी सेवा करूंगी , पर आप यह तो बताइए कि ऐसा क्यों ?
क्यों-मत पूछो। इस समय मुझे अकेले छोड़ दो। मैं सोना चाहता हूँ।
मैना ने स्थिर होकर कुछ विचार किया। उसने कहा-तो मेरी बात मानिए। जैसा भी कहती हूँ। वैसा कीजिए।
मधुबन ने कहा-अच्छा, जो तुम कहो वही करूंगा।
मैना ने पलंग पर से चादर को रुपया समेत बटोर लिया और धीरे से दूसरी छोटी कोठरी में चली गई।
थोड़ी देर के बाद जब वह उसमें से निकली तो उसके मुँह पर चंचलता न थी। हाथ में एक कटोरा दूध था। मधुबन के मुँह से लगाकर उसने कहा…पी जाइए।
मधुबन बच्चों की तरह पीने लगा-उसका कंठ प्यास से सूख रहा था। दूध पीकर मधुबन ने मैना से कहा-मैं कुछ दिनों के लिए धामपुर छोड़ देना चाहता हूँ। रामजस वाले मामले में पुलिस मेरे पीछे पड़ी है। अब एक और कांड हो गया है। मैना ! तुम वेश्या हो तो क्या, न जाने क्यों मैं तुम्हारे ऊपर विश्वास करता हूँ। तुम तितली की रक्षा करना, वह निरपराध !
इसके आगे मधुबन कुछ न कह सका। वह सिसककर रोने लगा। मैना की आंखों से भी आंसू बहने लगे। उसने बड़ी देर तक मधुबन को समझाया और कहा कि – घबराने की कोई बात नहीं। तुम सीधे गंगा के किनारे-किनारे भागो, फिर चुनार जाकर रेल पर चढ़ना। इधर कोई तुम्हारा पता न पावेगा। एक पहर रात रहते मैं तुम्हें जगा दूंगी। इस समय सो जाओ।
मधुबन आज्ञाकारी बालक के समान सोने की चेष्टा करने लगा पर उसे नींद कहाँ आती थी !
मैना ने उसके पास जाकर समय बिताया। जब पीपल पर पहला कौआ अपने आलस भरे स्वर में एक टीस हुई। अपनी जन्मभूमि छोड़ने का यह पहला अवसर था।
मैना ने उसे समझाया कि तुम कुछ दिन कलकत्ते रहो, फिर यहाँ सब ठीक हो जाएगा तो तुमको पत्र लिखूंगी।
उस पिछली रात में मधुबन चल पड़ा। कच्ची सड़क, जो गंगा के घाट पर जाती थी, सुनसान पड़ी थी- धूल ठंडी थी, चांदनी फीकी। मधुबन अपनी धुन में चल रहा था। घाट पर पहुँचते-पहुँचते उजेला हो चला। एक नाव बनारस जाने के लिए थी। मांझी मधुबन की जान-पहचान का था। उसने पूछा-मधुबन बाबू इतना सवेरे ?
तुम कहाँ- मधुबन ने नाव पर बैठते हुए कहा-जानते नहीं हो ? रामजस के मुकदमे में पुलिस मुझको भी चाहती है। मैं बनारस जा रहा हूँ। वकील से सलाह करने।
