तितली
३ — २
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सहसा एक दिन इन्द्रदेव को यह चेतना हुई कि वह जो कुछ पहले थे, अब नहीं रहे ! उन्हें पहले भी कुछ-कुछ ऐसा भान होता था कि परदे पर एक दूसरा चित्र तैयारी से आने वाला है, पर उसके इतना शीघ्र आने की संभावना न थी। शैला के लिए वह बार-बार सोचने लगे थे। उसकी क्या स्थिति होगी, यही वह अभी नहीं समझ पाते थे। कभी-कभी वह शैला के संसर्ग से अपने को मुक्त करने की भी चेष्टा करने लगते-यह भी विरक्ति के कारण नहीं, केवल उसका गौरव बनाने के लिए। उनके कुटुंब वालों के मन में शैला को वेश्या से अधिक समझने की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। यह प्रच्छन्न व्यंग्य उन्हें व्यथित कर देता था।
उधर शैला भी इससे अपरिचित थी – ऐसी बात नहीं। तब भी इन्द्रदेव से अलग होने की कल्पना उसके मन में नहीं उठती थी। इसी बीच में उसने शहर में जाकर मिशनरी सोसाइटी से भी बातचीत की थी। उन लोगों ने स्कूल खोलकर शिक्षा देने के लिए उसे उकसाया।
किंतु उसने मिशनरी होना स्वीकार नहीं किया। इधर वह बाबा रामनाथ के यहाँ हितोपदेश पढ़ने भी पढ़ने भी जाती थी अर्थात् इन्द्रदेव और शैला दोनों ही अपने को बहलाने की चिंता में थे। वे इस उलझन को स्पष्ट करने के लिए क्या-क्या करने की बातें सोचते थे, पर एक-दूसरे से कहने में संकुचित ही नहीं, किंतु भवभीत भी थे, क्योंकि इन्द्रदेव के परिवार में परिवार में घटनाएं बड़े वेग से विकसित हो रही थीं। किंसी भी क्षण में विस्फोट होकर कलह प्रकट हो सकता था।
इमली के पेड़ के नीचे आरामकुर्सियों पर शैला और इन्द्रदेव बैठकर एक-दूसरे को चुपचाप देख रहे थे। प्रभात की उजली धूप टेबुल पर बिछे हुए रेशमी कपड़ों पर, रह-रहकर तड़प उठती थी, जिस पर धरे हुए फूलदान के गुलाबों में से एक भीनी महक उठकर उनके वातावरण को सुगंधपूर्ण कर रही थी।
इन्द्रदेव ने जैसे घबराकर कहा-शैला !
क्या !
तुम कुछ देख रही हो ?
सब कुछ। किंतु इतने विचारमूढ़ कयों हो रहे हो ? यही समझ में नहीं आता।
तुम्हारी वह कल्पना सफल होती नहीं दिखाई देती। इसी का मुझे दु:ख है।
किंतु अभी हम लोगों ने उसके लिए कुछ किया भी तो नहीं।
कर नहीं सकते।
यह मैं नहीं मानती।
तुमको कुछ मालूम है कि तुम्हारे संबंध में यहाँ कैसी बातें फैलाई जा रही हैं ?
हाँ ! मैं रात-रात को घूमा करती हूँ, जो भारतीय स्त्रियों के लिए ठीक नहीं। मैं रामनाथ के यहाँ संस्कृत पढ़ने जाती हूँ। यह भी बुरा करती हूँ। और, तुमको भी बिगाड़ रही हूँ। यही बात न ? अच्छा, इन बातों के किसी-किसी अंश पर देखती हूँ कि तुम भी अधिक ध्यान देने लगे हो। नहीं तो इतना सोचने-विचारने की क्या आवश्यकता थी ? मैं –
इतना ही नहीं। मैं अब इसलिए चिंतित हूँ कि अपना और तुम्हारा संबंध स्पष्ट कर दूं। यह ओछा अपवाद अधिक सहन नहीं किया जा सकता।
किंतु में अभी उस प्रश्न पर विचारने की आवश्यकता ही नहीं समझती !- शैला ने ईषत् हंसी से कहा।
क्यों ?
तुम्हारे संसर्ग से जो मैंने सीखा है, उसका पहला पाठ यही है कि दूसरे मुझको क्या कहते हैं, इस पर इतना ध्यान देने की आवश्यकता नहीं। पहले मुझे ही अपने विषय में सच्ची जानकारी होनी चाहिए। मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी जमींदारी के दातव्य विभाग से जो खर्च स्वीकृत हुआ है, उसी में मैं अपना और औषधालय का काम चलाऊं। बैंक में भी कुछ काम कर सकूं, तो उससे भी कुछ मिल जाया करेगा। और मेरी स्वतंत्र स्थिति इन प्रवादों को स्वयं ही स्पष्ट कर देगी।
बात तो ठीक है – इन्द्रदेव ने कुछ सोचकर धीरे-से कहा।
पर इसके लिए तुमको एक प्रबंध कर देना पड़ेगा। पहले मैंने सोचा था कि गांव में कई जगह कर्म-केंद्र की सृष्टि हो सकती है। भिन्न-भिन्न शक्ति वाले अपने-अपने काम में जुट जाएंगे। किंतु अब मैं देखती हूँ कि इसमें बड़ी बाधा है, और में उन पर इस तरह नियंत्रण न कर सकूंगी। इसलिए बैंक और औषधालय, ग्रामसुधार और प्रचार-विभाग, सब एक ही स्थान पर हों।
तो ठीक है ! शेरकोट में ही सब विभागों के लिए कमरे बनवाने की व्यवस्था कर दो न !
किंतु इसमें मैं एक भूल कर गई हूँ। क्या उसके सुधारने का कोई उपाय नहीं है ?
भूल कैसी ?
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जान-बूझकर एक रहस्यपूर्ण घटना को जन्म देते हैं। स्वयं उसमें पड़ते हैं और दूसरों को भी फंसाते हैं। मैं भी शेरकोट को बैंक के लिए चुनने में कुछ इस तरह मूर्ख बनाई गई हूँ।
इन्द्रदेव ने हंसने हुए कहा-मैं देख रहा हूँ कि तुम अधिक भावनामयी होती जा रही हो। यह संदेह अच्छा नहीं। शेरकोट के लिए तो मां ने सब प्रबंध कर भी दिया है। अब फिर क्या हुआ ?
शेरकोट एक पुराने वंश की स्मृति है। उसे मिटा देना ठीक नहीं। अभी मधुबन नाम का एक युवक उसका मालिक है। तहसीलदार से उसकी कुछ अनबन है, इसलिए यह …
मधुबन ! अच्छा मैं क्या कर सकता हूँ। तुम बैंक न भी बनवाओ, तो होता क्या है। अब तो वह बेचारा उस शेरकोट से निकाला ही जाएगा।
तुम एक बार मां से कहो न ! और नीलवाली कोठी की मरम्मत करा दो, इसमें रुपए भी कम लेंगे, और ….
नीलवाली कोठी ! आश्चर्य से इन्द्रदेव ने उसकी ओर देखा।
हाँ, क्यों ?
अरे वह तो भुतही कोठी कहीं जाती है।
जहाँ मनुष्य नहीं रहते वहीं तो भूत रह सकेंगे ? इन्द्रदेव ! मैं उस कोठी की बहुत प्यार करती हूँ।
कब से शैला ? – हंसते हुए इन्द्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।
इन्द्र। तुम नहीं जानते। मेरी मां यहीं कुछ दिनों तक रह चुकी है।
इन्द्रदेव की आंखें जैसी बड़ी हो गई। उन्होंने कुर्सी से उठ खड़े होकर कहा-तुम क्या कह रही हो ?
बैठो और सुनो। मैं वही कह रही हूँ, जिसके मुझे सच होने का विश्वास हो रहा है। तुम इसके लिए कुछ करो। मुझे तुमसे दान लेने में तो कोई संकोच नहीं। आज तक तुम्हारे ही दान पर मैं जी रही हूँ, किंतु वहाँ रहने देकर मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता तुम दे सकते हो। और, मेरी जीविका का उपाय भी कर सकते हो।
शैला की इस दीनता से घबराकर इन्द्रदेव ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा- है।
शैला ! तुम काम-काज की इतनी बातें करने लगी हो कि मुझे आश्चर्य हो रहा है। जीवन में यह परिवर्तन सहसा होता है, किंतु यह क्या ! तुम मुझको एक बार ही कोई अन्य व्यक्ति क्यों समझ बैठी हो? मैं तुमको दान दूंगा ? कितने आश्चर्य की बात है !
यह सत्य है इन्द्रदेव ! इसे छिपाने से कोई लाभ नहीं। अवस्था ऐसी है कि अब मैं तुमसे अलग होने की कल्पना करके दुखी होती हूँ, किंतु थोड़ी दूर हटे बिना काम भी नहीं चलता। तुमको और अपने को समान अंतर पर रखकर, कुछ दिन परीक्षा लेकर, तब मन से पूछूंगी।
क्या पूछोगी शैला !
कि वह क्या चाहता है। तब तक के लिए यही प्रबंध रहना ठीक होगा। मुझे काम करना पड़ेगा, और काम किए बिना यहाँ रहना मेरे लिए असंभव है। अपनी रियासत में मुझे एक नौकरी और रहने की जगह देकर मेरे बोझ से तुम इस समय के लिए छुट्टी पा जाओ, और स्वतंत्र होकर कुछ अपने विषय में भी सोच लो।
शैला बड़ी गंभीरता से उनकी ओर देखते हुए फिर कहने लगी-हम लोगों के पश्चिमी जीवन का यह संस्कार है कि व्यक्ति को स्वावलंब पर खड़े होना चाहिए। तुम्हारे भारतीय हृदय में, जो कौटुंबिक कोमलता में पला है, परस्पर सहानुभूति की-सहायता की बड़ी आशाएं, परंपरागत संस्कृति के कारण, बलवती रहती हैं। किंतु मेरा जीवन कैसा रहा है, उसे तुमसे अधिक कौन जान सकता है ! मुझसे काम लो और बदले में कुछ दो।
अच्छा, यह सब मैं कर लूंगा, पर मधुबन के शेरकोट का क्या होगा ? मैं नहीं कहना चाहता। मां न जाने क्या मन में सोचेंगी। जबकि उन्होंने एक बार कह दिया, तब उसके प्रतिकूल जाना उनकी प्रकृति के विरुद्ध है। तो भी तुम स्वयं कहकर देख लो।
यह मैं नहीं पसंद करती इन्द्रदेव ! मैं चाहती हूँ कि जो कुछ कहना हो, अपनी माताजी से तुम्हीं कहो। दूसरों से वही बात सुनने, पर जिसे कि अपनों से सुनने की आशा करती है – मनुष्य के मन में एक ठेस लगती है। यह बात अपने घर में तुम आरंभ न करो।
देखो शैला। वह आरंभ हो चुकी है, अब उसे रोकने में असमर्थ हूँ। तब भी तुम कहती हो, तो मैं ही कहकर देखूंगा कि क्या होता है। अच्छा तो जाओ, तुम्हारे हितोपदेश के पाठ का यही समय है न ! वाह ! क्या अच्छा तुमने यह स्वांग बनाया है।
शैला ने स्निग्ध दृष्टि से इन्द्रदेव को देखकर कहा-यह स्वांग नहींहै, मैं तुम्हारे समीप आने का प्रयत्न कर रही हूँ – तुम्हारी संस्कृति का अध्ययन करके।
अनवरी को आते देखकर उल्लास से इन्द्रदेव ने कहा-शीला ! शेरकोट वाली बात अनवरी से ही मां तक पहुंचाई जा सकती है।
शैला प्रतिवाद करना ही चाहती थी कि अनवरी सामने आकर खड़ी हो गई। उसने कहा-आज कई दिन से आप उधर नहीं आई हैं। सरकार पूछ रही थीं कि…
अरे पहले बैठ तो जाइए -कुर्सी खिसकाते हुए शैला ने कहा, मैं तो स्वयं अभी चलने के लिए तैयार हो रही थी।
अच्छा –
हाँ, शरेकोट के बारे में रानी साहबा से मुझे कुछ कहना था। मेरे भ्रम से एक बड़ी बुरी बात हो रही है, उसे रोकने के लिए …
क्या ?
मधुबन बेचारा अपनी झोंपड़ी से भी निकाल दिया जाएगा। उसके बाप-दादों की डीह है। मैंने बिना समझे बूझे बैंक के लिए वही जगह पसंद की। उस भूल को सुधारने के लिए मैं अभी ही आने वाली थी।
मधुबन ! हाँ, वहीं न, जो उस दिन रात को आपके साथ था, जब आप नील-कोठी से आ रही थीं ? उस पर तो आपको दया करनी ही चाहिए-कहकर अनवरी ने भेद-भरी दृष्टि से इन्द्रदेव की ओर देखा।
इन्द्रदेव कुर्सी छोड़ उठ खड़े हुए।
शैला ने निराशा दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए कहा- तो इस मेरी दया में आपकी सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है। चलिए।
क्यों बेटी ! तुमने सोच-विचार लिया ? – कोठरी के बाहर बैठे हुए रामनाथ ने पूछा।
भीतर से राजकुमारी ने कहा-बाबाजी, हम लोग इस समय ब्याह करने के लिए रुपए कहाँ से लावें ?
रुपयों से ब्याह नहीं होगा बेटी ! ब्याह होगा मधुबन से तिलली का। तुम इसे स्वीकार कर लो, और जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। मैं अब बूढ़ा हुआ, तितली की तुम लोगों की स्नेह-छाया में दिए बिना मैं कैसे सुख से मरूंगा ?
अच्छा, पर एक बात और भी आपने समझ ली है ? क्या मधुबन, तितली के साथ गृहस्थी चलाने के लिए, दु:ख-सुख भोगने के लिए तैयार है ? वह अपनी सुध-बुध तो रखता ही नहीं। भला उसके गले एक बछिया बांधकर क्या आप ठीक करेंगे ?
सुनो बेटी, दस बीघा तितली के, और तुम लोगों के जो खेत हैं – सब मिलाकर एक छोटी-सी गृहस्थी अच्छी तरह चल सकेगी। फिर तुमको तो यही सब देखना है, करना है, सब सम्हाल लोगी। मधुबन भी पढ़ा-लिखा परिश्रमी लड़का है। लग-लपटकर अपना घर चला ही लेगा।
मधुबन से भी आप पूछ लीजिए। वह मेरी बात सुनता कब है। कई बार मैंने कहा कि अपना घर देख, वह हंस देता है, जैसे उसे इसकी चिंता ही नहीं। हम लोग न जाने कैसे अपना पेट भर लेते हैं। फिर पराई लड़की घर में ले आकर तो उसकी तरह नहीं चल सकता।
तुम भूलती हो बेटी ! पराई लड़की समझता तो मैं उसके ब्याह की यहाँ चर्चा न चलाता। मधुबन और तितली दोनों एक-दूसरे की अच्छी तरह पहचान गए हैं। और तितली पर तुमको दया ही नहीं करनी होगी, तुम उसे प्यार भी करोगी। उसे तुमने इधर देखा है ?
नहीं, अब तो वह बहुत दिन से इधर आती ही नहीं।
आज मेम साहब के साथ वह भी नहाने गई है। शैला का नाम तो तुमने सुना होगा ? वही जो यहाँ के जमींदार इन्द्रदेव के साथ विलायत से आई है। बड़ी अच्छी सुशील लड़की है। वह भी मेरे यहाँ संस्कृत पढ़ती है। तुम चलकर उन दोनों से बात भी कर लो और देख भी लो।
अच्छा, मैं अभी आती हूँ।
मैं भी चलता हूँ बैटी ! मधुबन उनके संग नहीं है। मल्लाह को तो सहेज दिया है। तो चलूं।
रामनाथ नहाने के घाट की ओर चले। राजकुमारी भी रामदीन की नानी के साथ गंगा की ओर चली।
अभी वह शेरकोट से बाहर निकलकर पथ पर आई थी कि सामने से चौबेजी दिखाई पड़े। राजकुमारी ने एक बार घूंघट खींचकर मुड़ते हुए निकल जाना चाहा। किंतु चौबे ने सामने आकर टोक ही दिया-भाभी हैं क्या ? अरे मैं तो पहचान ही न सका !
दुख में सब लोग पहचान लें, ऐसा तो नहीं होता। राजकुमारी ने अनखाते हुए कहा।
अरे नहीं-नहीं ! मैं भला भूल जाऊंगा ? नौकरी ठहरी। बराबर सोचता हूँ कि एक दिन शेरकोट चलूं, पर छुट्टी मिले तब तो। आज मैंने भी निश्चय कर लिया था कि भेंट करूंगा ही।
चौबेजी के मुँह पर एक स्निग्धता छा गई थी, वह मुस्कुराने की चेष्टा करने लगे।
किंतु मैं नहाने जा रही हूँ।
अच्छी बात है, मैं थोड़ी देर में आऊंगा। – कहकर चौबेजी दूसरी ओर चले गए, और राजकुमारी को पथ चलना दूभर हो गया !
कितने बरस पहले की बात है ! जब वह ससुराल में थी, विधवा होने पर भी बहुत-सादु:ख, मान-अपमान भरा समय वह बिता चुकी थी। वह ससुराल की गृहस्थी में बोझ-सी हो उठी थी। चचेरी सास के व्यंग्य से नित्य ही घड़ी-दो-घड़ी कोने में मुँह डालकर रोना पड़ता। सब कुछ सहकर भी वहीं खटना पड़ता।
ससुराल के पुरोहितों में चौबेजी का घराना था। चौबे प्राय: आते-जाते वैसे ही, जैसे घर के प्राणी, और गांव के सहज नाते से राजकुमारी के वह देवर होते-हंसने-बोलने की बाधा नहीं थी।
राजकुमारी के पति के सामने से ही यह व्यवहार था। विधवा होने पर भी वह छूटा नहीं। उस निराश और कष्ट के जीवन में भी कभी-कभी चौबे आकर हंसी की रेखा खींच देते। दोनों के हृदय में एक सहज स्निग्धता और सहानुभूति थी। दिन-दिन वहीं बढ़ने लगी। स्त्री का हृदय था, एक दुलार का प्रत्याशी, उसमें कोई मलिनता न थी।
चौबे भी अज्ञात भाव से उसी का अनुकरण कर हे थे। पर वह कुछ जैसे अंधकार में चल रहे थे। राजकुमारी फिर भी सावधान थी !
एक दिन सहसा नियमित गालियां सुनने के समय जब चौबे का नाम भी उसमें मिलकर भीषण अट्टहास कर उठा, तब राजकुमारी अपने मन में न जाने क्यों वास्तविकता को खोजने लगी। वह जैसे अपमान की ठोकर से अभिभूत होकर उसी ओर पूर्ण वेग से दौड़ने के लिए प्रस्तुत हुई, बदला लेने के लिए और अपनी असहाय अवस्था का अवलंब खोजने के लिए। किंतु वह पागलपन क्षणिक हो रहा। उसकी खीझ फल नहीं पा सकी। सहासा मधुबन को सम्हालने के लिए उसे शेरकोट चले आना पड़ा। वह भयानक आंधी क्षितिज में ही दिखलाई देकर रुक गई। चौबे नौकरी करने लगे राजा साहब के यहाँ, और राजकुमारी शेरकोट के झाडू और दीए में लगी – यह घटना वह संभव !! भूल गई थी, किंतु आज सहसा विस्मृत चित्र सामने आ गया।
राजकुमारी का मन अस्थिर हो गया। वह गंगाजी के नहाने के घाट तक बड़ी देर से पहुंची।
शैला और तितली नहाकर ऊपर खड़ी थीं। बाबा रामनाथ अभी संध्या कर रहे थे। राजकुमारी को देखते ही तितली ने नमस्कार किया और शैला से कहा- आप ही हैं, जिनकी बात बाबाजी कर रहे थे ?
शैला ने कहा- अच्छा! आप ही मधुबन की बहिन हैं ? जी।
में मधुबन के साथ पढ़ती हूँ। आप मेरी भी बहन हुई न ? शैला ने सरल प्रसन्नता से कहा।
राजकुमारी ने मेम के इस व्यवहार से चकित होकर कहा-मैं आपकी बहन होने योग्य हूँ ? यह आपकी बड़ाई है।
क्यों नहीं बहन ! तुम ऐसा क्यों सोचती हो ? आओ, इस जगह बैठ जाएं।
अच्छा होगा कि तुम भी स्नान कर लो, तब हम लोग साथ ही चलें।
नहीं, आपको विलंब होगा। – कहकर राजकुमारी विशाल वृक्ष के नीचे पड़े हुए पत्थर की ओर बढ़ी।
शैला और तितली भी उसी पर जाकर बैठीं।
राजकुमारी का हृदय स्निग्ध हो रहा था। उसने देखा, तितली अब वह चंचल लड़की न रही, जो पहले मधुबन के साथ खेलने आया करती थी। उसकी काली रजनी-सी उनींदी आंखें जैसे सदैव कोई गंभीर स्वप्न देखती रहती हैं। लंबा छरहरा अंग, गोरी-पतली उंगलियां, सहज उन्नत ललाट, कुछ खिंची हुई भौंहे और छोटा-सा पतले-पतले अधरोंवाला मुख-साधारण कृषक-बालिका से कुछ अलग अपनी सत्ता बता रहे थे। कानों के ऊपर से ही घूंघट था, जिससे लटें निकली पड़ती थीं। उसकी चौड़ी किनारे की धोती का चंपई रंग उसके शरीर में धुला जा रहा था। वह संध्या के निरभ्र गगन में विकसित होने वाली-अपने ही मधुर आलोक से तुष्ट-एक छोटी-सी तारिका थी।
राजकुमारी, स्त्री की दृष्टि से, उसे परखने लगी, और रामनाथ का प्रस्ताव मन-ही-मन दुहराने लगी।
शैला ने कहा-अच्छा, तुम कहीं आती-जाती नहीं हो बहन !
कहाँ जाऊं ?
तो मैं ही तुम्हारे यहाँ कभी-कभी आया करूंगा। अकेले घर में बैठे-बैठे कैसे तुम्हारा मन लगता है ?
बैठना ही तो नहीं है ! घर का काम कौन करता है ? इसी में दिन बीतता जा रहा है। देखिए, यह तितली पहले मधुबन के साथ कभी-कभी आ जाती थी, खेलती थी। अब तो सयानी हो गई है। क्यों री, अभी तो ब्याह भी नहीं हुआ, तू इतनी लजाती क्यों है ? घूमकर जब उसने तितली की ओर देखकर यह बात कही, तो उसके मुख पर एक सहज गंभीर मुस्कान-लज्जा के बादल में बिजली सी चमक उठी।
शैला ने उसकी ठोढ़ी पकड़कर कहा-यह तो अब यहीं आकर रहना चाहती है न, तुम इसको बुलाती नहीं हो, इसीलिए रुठी हुई है।
तितली को अपनी लज्जा प्रकट करने के लिए उठ जाना पड़ा। उसने कहा-क्यों नहीं आऊंगी।
बाबा रामनाथ ऊपर आ गए थे। उन्होंने कहा-अच्छा, तो अब चलना चाहिए।
फिर राजकुमारी की ओर देखकर कहा-तो बेटी, फिर किसी दिन आऊंगा।
राजकुमारी ने नमस्कार किया। वह नहाने के लिए नीचे उतरने लगी, और शैला तितली के साथ रामनाथ का अनुसरण करने लगी।
गंगा के शीतल जल में राजकुमारी देर तक नहाती रही, और सोचती थी अपने जीवन की अतीत घटनाएं। तितली के ब्याह के प्रसंग से और चौबे के आने-जाने से नई होकर वे उसकी आंखों के सामने अपना चित्र उन लहरों में खींच रही थीं। मधुबन की गृहस्थी का नशा उसे अब तक विस्मृति के अंधकार में डाले हुए था। वह सोच रही थी – कया वहीं सत्य था ? इतना दिन जो मैंने किया, वह भ्रम था ! मधुबन जब ब्याह कर लेगा, तब यहाँ मेरा क्या काम रह जाएगा ? गृहस्थी ! उसे चलाने के लिए तो तितली आ ही जाएगी। अहा ! तितली कितनी सुंदर है ! मधुबन प्रसन्न होगा। और मैं …? अच्छा, तब तीर्थ करने चली जाऊंगी। उंह ! रुपया चाहिए उसके लिए-कहाँ से आवेगा ? अरे जब घूमना ही है, तो क्या रुपए की कमी रह जाएगी ? रुपया लेकर करूंगी ही क्या ? भीख मांगकर या परदेश में मजूरी करके पेट पालूंगी। परंतु आज इतने दिनों पर चौबे !
उसके हृदय में एक अनुभूति हुई, जिसे स्वयं स्पष्ट न समझ सकी। एक विकट हलचल होने लगी। वह जैसे उन चपल लहरों में झूमने लगी।
रामदीन की नानी ने कहा – चलो मालकिन, अभी रसोई का सारा काम पड़ा है, मधुबन बाबू आते होंगे।
राजकुमारी जल के बाहर खीझ से भरी निकली ! आज उसके प्रौढ़ वय में भी व्यय-विहीन पवित्र यौवन चंचल हो उठा था। चौबे ने उससे फिर मिलने के लिए कहा था। वह आकर लौट न जाए।
वह जल से निकलते ही घर पहुँचने के लिए व्यग्र हो उठी।
