तितली
६ — १
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गंगा की लहरियों पर मध्याह्न के सूर्य की किरणें नाच रही थीं। उन्हें अपने चंचल हाथों से अस्त-व्यस्त करती हुई, कमर-भर जल में खड़ी, मलिया छीटे उड़ा रही थी। करारे के ऊपर मल्लाहों की छोटी-सी बस्ती थी। सात घर मल्लाहों और तीन घर कहारों के थे। मलिया और रामदीन का घर भी वहीं था। दोपहर को छावनी से छुट्टी लेकर, दोनों ही अपने घर आए थे। रामदीन करारे से उतरता हुआ कहने लगा-मलिया, मैं भी आया।
मलिया हंसकर बोली-मैं तो जाती हूँ।
जाओगे क्यों ? वाह ? – कहते हुए रामदीन ‘धम’ से गंगा में कूद पड़ा।
थोड़ी दूर पर एक बुड्ढा मल्लाह बंसी डाले बैठा था, उसने क्रोध से कहा-देखो रामदीन, तुम छावनी के नौकर हो, इससे मैं डर न जाऊंगा। मछली न फंसी, तो तुम्हारी बुरी गत कर दूंगा।
तैरते हुए रामदीन ने कहा – अरे क्यों बिगड़ रहे हो दादा ! आज कितने दिनों पर छुट्टी मिली है। ऊधम मचाने अब कहाँ आता हूँ।
तैरते हुए तीर की ओर लौटकर उसने मलिया के पास पहुँचने का ज्यों ही उपक्रम किया, वह गंगा से निकलने लगी। रामदीन ने कहा-अरे क्या मैं काट लूंगा ? मलिया, ठहर न !
वह रुक गई।
रामदीन ने धीरे से पास आकर पूछा -‘’क्यों रे, तेरी सगाई पक्की हो गई ?’’
उसने कहा- ‘’धत !’’
रामदीन ने कहा-तो आज मैं तेरे चाचा से कहूँ कि ..
मलिया ने बीच ही में बात काटकर कहा-देखो, मुझे गाली दोगे तो…हाँ, कहे देती हूँ।
क्या कहे देती है ? क्या मुझे डराती है ? अब तो मुझे तेरी बीबी रानी का डर नहीं। मलिया, तू जानती है छोटी कोठी में मेम साहब जब से आई हैं, तब से मैं ही उनका खाना बनाता हूँ, चौबेजी का काम भी मैं ही करता हूँ ? अब तो…
मेम साहब के भरोसे कूद रहे हो न ! देखो तो तुम्हारी मेम साहब की दुर्दशा चार दिन में होती है। बीबी रानी …
क्या …बकती है ! चल, अपना काम देख ! वह तो कहती थीं कि रामदीन, तुझको मैं सरकार से कहकर खेत दिलवा दूंगी। वहीं …
चल, अपना मुँह देख, मुझसे चला है सगाई करने ! तीन ही दिन में छोटी कोठी से भी तेरी मेम साहब भागती हैं। तब लेना खेत !
अरे तो क्या …
आगे रामदीन कुछ न बोल सका, क्योंकि एक गौर वर्ण की प्रौढ़ा स्त्री धोती लिए हुए उत्तर की ओर से धीरे-धीरे गंगा में उतर रही थी।
उसे देखते ही दोनों की सिट्टी भूल गई। दोनों ही गंगा जल में से निकलकर उसे अभिवादन करके भले मानसों की तरह अपनी-अपनी धोती पहनने लगे।
उस स्त्री के अंग पर कोई आभूषण न था, और न तो कोई सधवा का चिह्न ! था केवल उज्ज्वलता का पवित्र तेज, जो उसकी मोटी-सी धोती के बाहर भी प्रकट था।
एक पत्थर पर अपनी धोती रखते हुए उसने घूमकर पूछा-क्यों रे रामदीन, तुझे कभी घंटे भर की भी छुट्टी नहीं मिलती ? आज अठवारों हो गया, कोई सौदा ले आना है। तेरी नानी कहती थी, आज रामदीन आने वाला है। सो तू आज आने पर भी यहीं धमाचौकड़ी मचा रहा है?
मालकिन ! मैं नहाकर कोट में आ रही रहा था। यही मलिया बड़ी पाजी है, इसने धोती पर पानी के छींटे … सरकार …
रामदीन अपनी बनावटी बात को आगे न बढ़ा सका। बीच ही में मलिया अपनी सफाई देती हुई बोल उठी-इसकी छाती फट जाए, झूठा कहीं का ! मालकिन, यह मुझको गाली दे रहा है। इसका घमंड बढ़ गया है। मेम साहब का खानसामा बन गया है, तो चला है मुझसे सगाई करने !
मालकिन अपनी आती हुई हंसी को रोककर बोलीं-वह देख, इसकी नानी आ रही है, उसी से कह दे। मलिया, सचमुच रामदीन पाजी हो गया है।
दोनों ने देखा, बुढि़या-रामदीन की नानी-तांबे का एक घड़ा लिए धीरे-धीरे आ रही है।
मालकिन स्नान करने लगीं। कभी-कभी स्नान करने के लिए वह इधर आ जातीं, तो कई काम करती हुई जातीं। भाई मधुबन के लिए मछली लेना और मल्लाही-टोली की किसी प्रजा को सहेजकर गृहस्थी का और कोई काम करा लेना भी उनके नहाने का उद्देश्य होता।
उनको देखते ही बूढ़े मल्लाह ने अपनी बंसी खींची। मछली फंस चुकी थी।
वह स्नान करके सूर्य को प्रणाम करती हुई जब ऊपर आकर खड़ी हुई तो मल्लाह ने मछली सामने लाकर रख दी। उन्होंने रामदीनसे कहा-इसे लेता चल।
मलिया ने बुढि़या के स्नान कर लेने पर उसके लाए हुए घड़े को भर लिया। मालकिन की गीली धोती लेकर बुढिया उनके साथ हो गई।
मल्लाह ने कहा-मालकिन, आज इस पाजी रामदीन को बिना मारे मैं न छोड़ता। आज कई दिन पर मैं मधुबन बाबू के लिए मछली फंसाने बैठा था, यह आकर ऊधम मचाने लगा। इसी की चाल से बड़ा-सा रोहू आकर निकल गया। आज लगा है छावनी की नौकरी करने, तो घमंड का ठिकाना ही नहीं। हम लोग आपकी प्रजा हैं मालकिन ! यह बूढ़ा इस बात को नहीं भूल सकता। अभी कल का लड़का – यह क्या जाने कि धामपुर के असली मालिक-चार आने के पुराने हिस्सेदार – कौन हैं। मालकिन, बेईमानी से वह सब चला गया, तो क्या हुआ ? हम लोग अपने मालिक को न पहचानेंगे ?
मालकिन को उसका यह व्याख्यान अच्छा न लगा। उनके अच्छे दिनों का स्मरण करा देने की उस समय कोई आवश्यकता न थी। किंतु सीधा और बूढ़ा मल्लाह उस बिगड़े घर की बड़ाई में और कहता ही क्या ?
शेरकोट के कुलीन जमींदार मधुबन के पास अब तीन बीघे खेत और वही खंडहर-सा शेरकोट है, इसके अतिरिक्त और कुछ चाहे न बचा हो, किंतु पुरानी गौरव-गाथाएं तो आज भी सजीव हैं। किसी समय शेरकोट के नाम से लोग सम्मान से सिर झुकाते थे।
मधुबन के लिए वंश-गौरव का अभिमान छोड़कर, मुकदमे में सब कुछ हारकर, जब उसकेपिता मर गए, तो उसकी बड़ी विधवा बहन ने आकर भाई को सम्हाला था। उसकी ससुराल संपन्न थी, किंतु विधवा राजकुमारी के दरिद्र भाई को कौन देखता ! उसी ने शेरकोट के खंडहर में दीपक जलाने का काम अपने हाथों में लिया !
शेरकोट मल्लाही-टोले के समीप उत्तरकी ओर बड़े-से ऊंचे टीले पर था। मल्लाही-टोला और शेरकोट के बीच एक बड़ा – सा वट-वृक्ष था। वहीं दो-चार बड़े-बड़े पत्थर थे। उसी के नीचे स्नान करने का घाट था। मल्लाही-टोले में अब तो केवल दस घरों की बस्ती है परंतु जब शेरकोट के अच्छे दिन थे, तो उसकी प्रजा से-काम करने वालों से-यह गांव भरा था।
शेरकोट के विभव के साथ वहाँ की प्रजा धीरे-धीरे इधर उधर जीविका की खोज में खिसकने लगी। मल्लाहों की जीविका तो गंगातट से ही थी, वे कहाँ जाते ? उन्हीं के साथ दो-तीन कहारों के भी घर बच रहे-उस छोटी-सी बस्ती में।
कहीं-कहीं पुराने घरों की गिरी हुई भीतों के ढूह अपने दारिद्रय-मंडित सिर को ऊंचा करने की चेष्टा में संलग्न थे, जिसके किसी सिरे पर टूटी हुई धरनें, उन घरों का सिर फोड़ने वाली लाठी की तरह, अड़ी पड़ी थीं !
उधर शेरकोट का छोटा-सा मिट्टी का ध्वस्त दुर्ग था ! अब उसका नाममात्र है, और है उसके दो ओर नाले की खाई-एक ओर गंगा। एक पथ गांवों में जाने के लिए था। घर सब गिर चुके थे। दो-तीन कोठरियों के साथ एक आंगन बच रहा था।
भारत का वह मध्यकाल था, जब प्रतिदिन आक्रमणों के भय से एक छोटे-से भूमिपति को भी दुर्ग की आवश्यकता होती थी। ऊंची-नीची होने के कारण, शेरकोट में अधिक भूमि होने पर भी, खेती के काम में नहीं आ सकती थी। तो भी राजकुमारी ने उसमें फल-फूल और साग-भाजी का आयोजन कर लिया था।
शेरकोट के खंडहर में घुसते हुए राजकुमारी ने बूढ़े मल्लाह को बिदा किया। वह बूढ़ा मनुष्य कोट का कोई भी काम करने के लिए प्रस्तुत रहता। उसने जाते जाते कहा-मालकिन, जब कोई काम हो, कहला देना, हम लोग आपकी पुरानी प्रजा हैं, नमक खाया है।
उसकी इस सहानुभूति से राजकुमारी को रोमांच हो गया। उसने कहा-तुमसे न कहलाऊंगी, तो काम कैसे चलेगा, और कब नहीं कहलाया है ?
बूढ़ा दोनों हाथों को अपने सिर से लगाकर लौट गया।
रामदीन ने एक बार जैसे सांस ली। उसने कहा-तो मालकिन, कहिए, नौकरी छोड़ दूं ?
जो प्रेरणा उसे बूढे मल्लाह से मिली थी, वही उत्तेजित हो रही थी। राजकुमारी ने कहा-पागल ! नौकरी छोड़ देगा, तो खेत छिन जाएगा। गांव में रहने पावेगा फिर ? अब हम लोगों के वह दिन नहीं रहे कि तुमको नौकर रख लूंगा। मैंने तो इसलिए कहा था कि मधुबन ने कहीं पर खेत बनाया है, वही बाबाजी की बनजरिया में। कहता था कि ‘बहिन, एक भी मजूर नहीं मिला !’फिर बाबाजी और उसने मिलकर हल चलाया ! सुनता है रे रामदीन, अब बड़े घर के लोग हल चलाने लगे, मजूर नहीं मिलते, बाबाजी तो यह सब बात मानते ही नहीं। उन्होंने मधुबन से भी हल चलवाया। वह कहते हैं कि ‘हल चलाने से बड़े लोगों की जात नहीं चली जाती। अपना काम हम नहीं करेंगे, तो दूसरा कौन करेगा।’ आज-कल इस देश में जो न हो जाए। कहाँ मधुबन का वंश, कहाँ हल चलाना ! बाबाजी ने उसको पढ़ाया-लिखाया और भी न जाने क्या-क्या सिखाया। वह जाता है शहर यहाँ से बोझ लिवाकर सौदा बेचने ! जब मैं कुछ कहती हूँ, तो कहता है -‘बहन ! वह सब रामकहानी के दिन बीत गए। काम करके खाने में लाज कैसी। किसी की चोरी करता हूँ या भीख मांगता हूँ ?’धीरे-धीरे मजूर होता जा रहा है। मधुबन हल चलावे, यह कैसे सह सकती हूँ। इसी से तो कहती हूँ कि क्या दो घंटे जाकर तू उसका काम नहीं कर सकता था।
दोपहर का खाने-नहाने की छुट्टी तो किसी तरह मिलती है। कैसे क्या कहूँ, अभी न जाऊं तो रोटी भी रसोईदार इधर-उधर फेंक देगा। फिर दिन भर टापता रह जाऊंगा। मालकिन, पहले से कह दिया जाए, तो कोई उपाय भी निकाल लूं।
अच्छा, जा, कल आना तो मुझसे भेंट करके जाना, भूलना मत ! समझा न ? मधुबन मिले तो भेज दो।
रामदीन ने मछली रखते हुए सिर झुकाकर अभिवादन किया। फिर मलिया की ओर देखता हुआ वह चला गया।
रामदीन की नानी धूप में धोती फैलाकर रसोई-घर की ओर मछली लेकर गई। वह चौके में आग-पानी जुटाने लगी।
मलिया मालकिन के पास बैइ गई थी। राजकुमारी ने उनसे पूछा – मलिया ! तेरी ससुराल के लोग कभी पूछते हैं ?
उसने कहा-नहीं मालकिन, अब क्यों पूछने लगे।
राजकुमारी ने कहा-तो रामदीन से तेरी सगाई कर दूं न ?
आओ मालकिन, इसीलिए मुझको …
राजकुमारी उसकी इस लज्जित मूर्ति को देखकर रुक गई। उन्होंने बात बदलने के लिए कहा- तो आज-कल तू वहाँ रात-दिन रहती है ?
क्यों न रहूँगी। बीबीरानी माधुरी की तरेर-भरी आंखें देखकर ही छठी का दूध याद आता है। अरे बाप रे ! मालकिन, वहाँ से जब घर आती हूँ, तो जैसे बाघ के मुँह से निकल आती हूँ। इधर तो उनकी आंखें और भी चढ़ी रहती हैं। चौबे, जो पहले कुंवर साहब की रसोई बनाता था, आकर न मालूम क्या धीरे-धीरे फुसफसता जाता है। बस फिर क्या पूछना ! जिसकी दुर्दशा होनी हो वही सामने पड़ जाए।
क्यों रे, चौबे तो पहले तेरे कुंवर साहब के बड़े पक्षपाती थे। अब क्या हुआ जो ..
छावनी की बातें अच्छी तरह सुनने के लिए राजकुमारी ने पूछा। कोई भी स्वार्थ न हो, किंतु अन्य लोगों के कलह से थोड़ी देर मनोविनोद कर लेने की मात्रा मनुष्य की साधारण मनोवृत्तियों में प्राय: मिलती है। राजकुमारी के कुतूहल की तृप्ति भी उससे क्यों न होती ?
मलिया कहने लगी – मालकिन ! यह सब मैं क्या जानूं, पहले तो चौबेजी बड़े हंसमुख बने रहते थे। पर जब से बड़ी सरकार आई है, तब से चौबेजी इसी दरबार की ओर झुके रहते हैं। कुंवर साहब से तो नहीं पर मेम साहब से वह चिढ़ते हैं। कहते हैं, उसकी रसोई बनाना हमारा काम नहीं है। बीबीरानी से और भी न जाने क्या-क्या उसकी निंदाकरते हैं। सुना था, एक दिन वह रसोई बना रहे थे, भूल से मेम साहब जूते पहने रसोई-घर में चली आईं, तभी से वह चिढ़ गए, पर कुछ कह नहीं सकते थे। जब बड़ी सरकार आ गईं, तो उन्होंने इधर ही अपना डेरा जमाया। अब तो वह छोटी कोठी कुंवर जाकर, वहाँ क्या-क्या चाहिए-यही देख आते हैं –
क्यों रे ! क्या तेरे कुंवर साहब इस मेम से ब्याह करेंगे ?
मैं क्या जानूं मालकिन ! अब छुट्टी मिले। जाऊं, नहीं तो रसोईदार महाराज ही दो-चार बात सुनावेंगे।
अच्छा , जा, अभी तो चाचा के पास जाएगी न ?
हाँ, इधर से होती हुई चली जाऊंगी-कहकर मलिया अपने घर चली।
राजकुमारी से आकर रामदीन की नानी ने कहा-चलिए, अपनी रसोई देखिए। अभी मधुबन बाबू तो नहीं आए।
राजकुमारी ने एक बार शेरकोट के उजड़े खंडहर की ओर देखा और धीरे-धीरे रसोईघर की ओर चलीं।
रोटी सेंकते हुए राजकुमारी ने पूछा-बुढि़या, तू ने मलिया के चाचा से कभी कहा था।
क्या मालकिन ?
रामदीन से मलिया की सगाई के लिए। अब कब तक तू अकेली रहेगी ?
अपने पेट के लिए तो यह पाजी जुटा ले, सगाई करके क्या करेगा मालकिन ! ब्याह होता मधुबन बाबू का, हम लोगों को वह दिन आंखों से देखने को मिलता…
किसका रे बुढि़या !- कहते हुए मधुबन ने आते ही उसकी पीठ थपथपा दी।
राजकुमार ने कहा- रोटी खाने का अब समय हुआ है न ? मधु ! तुम कितना जलाते हो।
बहन ! मैं अपने आलू और मटर का पानी बरा रहा था, आज मेरा खेत सिंच गया।- कहकर वह हंस पड़ा। वह प्रसन्न था, किंतु राजकुमारी अपने पिता के वंश का वह विगत वैभव सोच रही थी, उनको हंसी न आई। इन्द्रदेव की कचहरी में आज कुछ असाधारण उत्तेजना थी। चिकों के भीतर स्त्रियों का समूह, बाहर पास-पड़ोस के देहातियों का जमाव था। शैला भी अपनी कुर्सी पर अलग बैठी थीं।
बनजरिया वाले बाबाजी अपनी कहानी सुनाने वाले थे, क्योंकि गोभी के लिए उसमें खेत बन गया था। उसी को लेकर तहसीलदार ने इन्द्रदेव को समझाया कि बनजरिया में बोने-जोतने का खेत है। उस पर एकरेज – या और भी जो कुछ कानून के वैध उपायों से देन लगाया ही होगा, क्योंकि गांव के लोग इससे तंग आ गए हैं। यह समाजी है, लड़कों को न जाने क्या-क्या सिखाता है- ऊंची जाति के लड़के हल चलाने लगे हैं। नीचों को बराबर कलकत्ता-बंबई कमाने जाने के लिए उकसाया करता है। इसके कारण लोगों को हलवाहों और मजूरों का मिलना असंभव हो गया है। तिस पर भी यह बनजरिया देवनन्दन के नाम की है। वह मर गया, अब लावारिस कानून के अनुसार यह जमींदार की है। – इत्यादि
इन्द्रदेव ने सब सुनकर कहा कि बुड्ढे की बात भी सुन लेनी चाहिए। उससे कह भी दिया गया है। उसको बुलवाया जाए।
आज इसीलिए रामनाथ आए हैं, और साथ में लिवाते आए हैं तितली को। तितली इस जन-समूह में संकुचित-सी- एक खंभे की आड़ में आधी छिपी हुई बैठी है।
इन्द्रदेव का संकेत पाकर रामनाथ ने कहना आरंभ किया –
बार्टली साहब की नील-कोठी टूट चुकी थी। नील का काम बंद हो चला था। जैसा आज भी दिखाई देता है, तब भी उस गुदाम के हौज और पक्की नालियां अपना खाली मुँह खोले पड़ी रहती थीं, जिससे नीम की छाया में गाएं बैठकर विश्राम लेती थीं। पर बार्टली साहब को वह ऊंचे टीले का बंगला, जिसके नीचे बड़ा-सा ताल था, बहुत ही पसंद था। नील गुदाम बंद हो जाने पर भी उनका बहुत-सा रुपया दादनी में फंसा था।
किसानों को नील बोना तो बंद कर देना पड़ा, पर रुपया देना ही पड़ता। अन्न की खेती से उतना रुपया कहाँ निकलता, इसलिए आस-पास के किसानों में बड़ी हलचल मची थी। बार्टली के किसान-आसामियों में एक देवनन्दन भी थे। मैं उनका आश्रित ब्राह्मण था। मुझे अन्न मिलता था और मैं काशी में जाकर पढ़ता था। काशी की उन दिनों की पंडित-मंडली में स्वामी दयानन्द के आ जाने से हलचल मची हुई थी। दुर्गाकुंड के उस शास्त्रार्थ में में भी अपने गुरुजी के साथ दर्शक-रूप से था, जिसमें स्वामीजी के साथ बनारसी चाल चली गई थी। ताली तो मैंने भी पीट दी थी। मैं क्वीन्स कॉलेज के एंग्लो-संस्कृत विभाग में पड़ता था। मुझे वह नाटक अच्छा न लगा। उस निर्भीक संन्यासी की ओर मेरा मन आकर्षित हो गया। वहाँ से लौटकर गुरुजी से मुझसे कहा-सुनी हो गई, और जब मैं स्वामीजी का पक्ष समर्थन करने लगा, तो गुरुजी ने मुझे नास्तिक कहकर फटकारा।
देवनन्दन का पत्र भी मुझे मिल चुका था कि कई कारणों से अन्य देना वह बंद करते हैं। मैं अपने गठरी पीठ पर लादे हुए झुंझलाहट से भरा नील-गुदाम के नीचे से अपने गांव में लौटा जा रहा था। देखा कि देवनन्दन को नील कोठी का पियादा काले खां पकड़े हुए ले जा रहा है। देवनन्दन सिंहपुर के प्रमुख किसान और आप ही लोगों के जाति-बांधव थे। उनकी यह दशा ! रोम-रोम उनके अन्न से पला था। मैं भी उनके साथ बार्टली के सामने जा पहुंचा।
उस समय कुर्सियों पर बैठे हुए बार्टली और उनकी बहन जेन आपस में कुछ बातें कर रहे थे।
जेन ने कहा-भाई ! इधर जब से वह चले गए हैं, मेरी चिंता बढ़ रही है। न जाने क्यों, मुझे उन पर संदेह होने लगा है। मैं भी घर जाना चाहती हूँ।
तुम जानती हो कि मैंने स्मिथ का कभी अपमान नहीं किया, और सच तो यह है कि मैं उसको प्यार करता हूँ। किंतु क्या करूं, उसका जैसा उग्र स्वभाव है, वह तो तुम जानती हो। मैं भला अभी काम छोड़कर कैसे चलूंगा ! बार्टली ने कहा।
जब यह काम ही बंद हो गया, तब यहाँ रहने का क्याकाम है। देखती हूँ कि जो रुपया तुम्हारा निकल भी आता है, उसे यहाँ जमींदारी में फंसाते जा रहे हो। क्या तुम यहीं बसना चाहते हो ? -जेन ने कहा।
तब तुम क्या चाहती हो। – बार्टली ने अन्यमनस्क भाव से पूर्व की धीरे-धीरे सूखने वाली झील को देखते हुए कहा।
नील का काम बंद हो गया, पर अब हम लोगों को रुपए की कमी नहीं। जो कुछ हो, यहाँ से बेचकर इंग्लैंड लौट चलें। मेरा प्रसव-काल समीप है। मैं गांव के घर में ही जाकर रहना चाहती हूँ। समझा न ? – जेन ने सरलता से कहा।
इतनी जल्दी ! असंभव, अभी बहुत रुपया बाकी पड़ा है। ठहरो, मैं पहले इन लोगों से बात कर लूं। – बार्टली ने रुखे स्वर से कहा।
देवनन्दन ने सलाम करते हुए कुछ कहना चाहा कि बीच ही में बात काटकर काले खां, ने कहा-सरकार, बहुत कहने पर यह आया है।
देवनन्दन ने रोष-भरे नेत्रों से काले को देखा।
बार्टली ने कहा-रुपया देते हो कि तुम्हारा दूसरा …
जेन उठकर जाने लगी थी। बीच ही में देवनन्दन ने उसे हाथ जोड़ते हुए कहा -मेरी स्त्री को लड़का होने वाला है, और लड़की …
जेन आगे न सुन सकी। उसने कहा-बार्टली, जाने दो उसे, उसकी स्त्री का…
तुम चलो चाय के कमरे में, मैं अभी आता हूँ। – कहते हुए बार्टली ने जेन को तीखी आंखों से देखा। दुखी होकर जेन चली गई।
देवनन्दन की कोई बिनती नहीं सुनी गई ! बार्टली ने कहा-काले खां, इसको यहीं कोठरी में बंद करो और तीन घंटे में रुपए न मिलें, तो बीस हंटर लगाकर तब मुझसे कहना।
बार्टली की ठोकर से जब देवनन्दन पृथ्वी चूमने लगा, तब वह चाय पीने चला गया।
मेरे हृदय में वह देवनन्दन का अपमान घाव कर गया।
मैं अब तक तो केवल वह दृश्य देख रहा था। किंतु क्षण-भर में मैंने अपना कर्तव्य निर्धारित कर लिया। मैंने कहा-काले खां, भूलना मत, मेरा नाम है रामनाथ। आज तुमने यदि देवनन्दन को मारा-पीटा, तो मैं तुम्हें जीता न छोडूंगा। मैं रुपए ले आता हूँ।
क्रोध और आवेश में कहने को तो मैं यह कहकर गांव में चला आया, पर रुपए कहाँ से आते ! मैं उन्हीं के पट्टीदार के पास पहुंचा, पर सूद का मोल-भाव होने लगा। उनकी स्थावर संपत्ति पर्याप्त न थी। हिंदुओं में परस्पर तनिक भी सहानुभूति नहीं ! मैं जल उठा। मनुष्य, मनुष्य के दुख-सुख से सौदा करने लगता है और उसका मापदंड बन जाता है रुपया। मैंने कहा-अच्छा, अच्छा, धामपुर में मेरी कृष्णार्पण माफी है, उसे भी मैं रेहन कर दूंगा।
तहसीलदार साहब ने कहा कि इस बनजरिया के नंबर पर पहले देवनन्दन का नाम था, सो ठीक है। मैंने ही उसकी संबंध में रेहन करके फिर इसी माफी को देवनन्दन के नाम बेच दिया। अब मेरे मन में गांव से घोर घृणा हो गई थी। मैं भ्रमण के लिए निकला। गांव पर मेरे लिए कोई बंधन नहीं रह गया। तीर्थों, नगरों और पहाड़ों में मैं घूमता था और गली, चौमुहानी, कुओं पर, तालाबों और घाटों के किनारे, मैं व्याख्यान देने लगा। मेरा विषय था हिंदू जाति का उद्बोधन। मैं प्राय: उनकी धनलिप्सा, गृह-प्रेम और छोटे-से-छोटे हिंदू गृहस्थ की राजमनोवृत्ति की निंदा किया करता ! आप देखते नहीं कि हिंदू की छोटी-सी गृहस्थी में कूड़ा-करकट तक जुटा रखने की चाल है, और उन पर प्राण से बढ़कर मोह ! दस-पांच गहने, दो-चार बर्तन, उनकी बीसों बार बंधक करना और घर में कलह करना, यही हिंदू-घरों में आए दिन के दृश्य हैं। जीवन का जैसे कोई लक्ष्य नहीं ! पद-दलित रहते-रहते उनकी सामूहिक चेतना जैसे नष्ट हो गई है। अन्य जाति के लोग मिट्टी या चीनी के बरतन में उत्तम स्निग्न भोजन करते हैं। हिंदू चांदी की थाली में भी सत्तू घोलकर पीता है। मेरी कटुता उत्तेजित हो जाती, तो और भी इसी तरह की बातें बकता। कभी तो पैसे मिलते और कहीं-कहीं धक्के भी। पर मेरे लिए दूसरा काम नहीं। इसी धुन में मैं कितने बरसों तक घूमता रहा। नर्मदा के तट से घूमकर मैं उज्जैन जा रहा था। अकस्मात् बिना किसी स्टेशन के गाड़ी खड़ी हो गई।
मैंने पूछा-क्या है ?
साथ के यात्री लोग भी चकित थे।
इतने में रेल के गार्ड ने कहा-भुखमरों की भीड़ रेलवे-लाइन पर खड़ी है।
मैं गाड़ी से उतरकर वह भीषण दृश्य देखने लगा।
संसार का नग्न चित्र, जिसमें पीड़ा का, दु:ख का, तांडव नृत्य था। बिना वस्त्र के सैकड़ों नर-कंकाल, इंजिन के सामने लाइन पर खड़े-खड़े और गिरे हुए, मृत्यु की आशा में टक लगाए थे। मैं रो उठा। मेरे हृदय में अभाव की भीषणता, जो चिनगारी के रूप में थी, अब ज्वाला-सी धधकने लगी।
चतुर गार्ड ने झोली में चंदा के पैसे एकत्र करके कंगलों में बांट दिया और वे समीप के बाजार की ओर दौड़ पड़े। हाँ, दौड़े। उन अभागों को अन्न की आशा ने बल दिया। वे गिरते-पड़ते चले। मैं भी चला। उनके पीछे-पीछे यह देखते जाता था कि पेड़ों में पत्तियां नहीं बची हैं। टिड्डियां भी इस तरह उन्हें नहीं खा सकतीं, वे तो नस छोड़ देती हैं।
मैंने देख कि वे मरभूखे बाजार में घूसे, किंतु मैं नहीं जा सका। बाजार के बाहर ही एक वृक्ष के बिना पत्तों वाली डालों के नीचे एक व्यक्ति पड़ा हुआ अपना हाथ मुँह तक ले जाता है और उसे चाटकर हटा लेता है। पास ही एक छोटा-सा जीव और भी निस्तब्ध पड़ा है। मैं दौड़कर अपने लोटे में दूध मोल ले आया। उसके गले में धीरे-धीरे टपकाने लगा। वह आंख खोलकर पास ही पड़े हुए शिशशु को देखने लगा। शिशु की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। मैंने उसे दूध पिलाने लगा।
कहकर बुड्ढा रामनाथ एक बार ठहर गया। उसने चारों ओर देखकर अपनी आंखों को उस खंभे की आड़ में ठहरा दिया, जहाँ तितली बैठी थी।
शैला रूमाल से अपनी आंखों पोंछ रही थी, और सुनने वाली जनता चुपचाप स्तब्ध थी।
बुड्ढे ने फिर कहना आरंभ किया-आप लोंगों को कष्ट होता है। दुख और दर्द की कहानी सुनाकर मैंने अवश्य आप लोगों का समय नष्ट किया। किंतु करता क्या ! अच्छा, जाने दीजिए, मैं अब बहुत संक्षेप में कहता हूँ –
हाँ, तो वह व्यक्ति थे देवनन्दन, जिनकी समस्त भू-संपत्ति नीलाम हो गई। धूर-धूर बिक गई। दो संतानों का शरीरांत हो गया। तब उस बची हुई कन्या को लेकर स्त्री के साथ वह परदेश में भीख मांगने चले थे।
उस अभागे को नहीं मालूम था कि वह किधर जा रहा था। उस समय अकाल था। कौन भीख देता ? जिनके पास रुपया था, उन्हें अपनी चिंता थी।
अस्तु, कुलीन वंश की सुकुमारी कुलबधू अधिक कष्ट न सह सकी, वह मर गई। तब देवनन्दन इस शिशु को लेकर घूमने लगे। वह भी मुमूर्ष हो रहा था।
उन्होंने बड़े कष्ट से मुझे पहचानकर केवल इतना कहा – रामनाथ, मैंने सब कुछ बेच दिया, पर तुम्हारा धामपुर का खेत नहीं बेचा है, और यह तितली तुम्हारी शरण में है। मैं तो चला।
हाँ, वह चल बसे। मैंने तितली को गोद में उठा लिया।
आगे बुड्ढा कुछ न कह सका, क्योंकि तितली सचमुच चीत्कार करती हुई मूर्च्छित हो गई थी और शैला उसके पास पहुँचकर उसे प्रफुल्लित करने में लग गई थी।
इन्द्रदेव आराम कुर्सी पर लेट गए थे, और सुनने वाले धीरे-धीरे खिसकने लगे।
