परज्या कौ रक्षा करै सोई स्वामि अनूपजान कविकवितापरज्या कौ रक्षा करै सोई स्वामि अनूप
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२० रचनाएँ

परज्या कौ रक्षा करै सोई स्वामि अनूपजान कविकविता
सदा झूठहीं बोलिहैं, तिहि आदर घटि जाइजान कविकविता
न्याव न कोऊ पाइहै, परै लालची कामजान कविकविता
ताकौं ढील न कीजिए ह्वै जु धरम को काजुजान कविकविता
जानि लेहू कवि जान कहि, सो राजत संपूरजान कविकविता
तीन भाँति के द्रुजन हैं पंडित कहत बिचित्रजान कविकविता
जो कुछ जैहै हाथ तें, काहू न ताकौ सोगजान कविकविता
ऐसो रूष लगाइये, जो ह्वै है फलवानजान कविकविता
परजा जानहु मूल तुम्ह, राजा ब्रिच्छ बिचारजान कविकविता
आदुर दये कुजात कूँ, नाहिन होत सुजातजान कविकविता
ठौर ठौर मनरथ फिरत, कोऊ छूट्यो नाहिंजान कविकविता
घटै बढ़ै निकसै छपै, ससि कपटी की पीतजान कविकविता
जो न समावै जगत मैं, ऐसा रूप अपारजान कविकविता
रिसु कै बस ना हूजिए, कीजै बात बिचारजान कविकविता
पाँच बात ये जगत मैं, निबहत नाहिं निदानजान कविकविता
दुष दै को न रुसाइये, कहत जान सुन मित्तजान कविकविता
मूरिख सिष मानत नहीं, सकु ज्यों पढ़त न कागजान कविकविता
उतम पुरुषन की सभा, रहिये निसदिन चाहिजान कविकविता
दुष दीने हूँ देत सुष उत्तम पुरुष सुजानिजान कविकविता
हँसि हँसि परिहै आपुही, बिनु हाँसी की ठौरजान कविकविता