गद्य और पद्य में रचा गया प्रेम और स्वप्न का संसार; मूल समर्पण और चारों स्वप्न खंड सहित।
विषय सूची
- १प्रारंभिक पाठ
- २प्रथम याम का स्वप्न
- ३प्रारंभिक पाठ — अगला पाठ — १
- ४प्रारंभिक पाठ — अगला पाठ — २
- ५प्रारंभिक पाठ — अगला पाठ — ३
- ६प्रारंभिक पाठ — अगला पाठ — ४
- ७दूसरा स्टेशन दिखाने लगा। विचित्र लीला, अब जल से थल हो गया। उस स्टेशन के स्तंभ दिखाने लगे, स्टेशन तो हैमिल्टन साहब की दुकान था। वाह रे ईश्वर! मनोरथ पूरा हुआ। चश्मा मिलने की आस लगी। दुकान पर उतरे। एक गोरी थोरी वैसवाली निकल आई, इस गोरी के पीछे एक पूछ भी थी। मैंने तो ऐसी स्त्री कभी नहीं देखी थी। मुख मनोहर और वदन मदन का सदन था। इस कामिनी के कुचकलशों पर दो बंदर नाचते थे, इनके नाम दंभाधिकारी और पाखंड थे। इन बंदरों के पूछ से कपट और घात नाम के दो बच्चे और लटकते थे। मैंने ऐसी लीला कभी नहीं देखी थी। करम ठोका आश्चर्य किया। साहस कर दुकान के भीतर जा पूछने लगा, ''गोरी तेरी दुकान में एक जोड़ चश्मा मिलैगा?'' उसने त्यूरी चढ़ा के उत्तर दिया, ''मूर्ख द्वापर और त्रेता में कभी चश्मा था भी कि तू माँगता है। तब सभी लोगों की दृष्टि अविकार रहती थी। यह तो कलियुग में जब लोग आँख रहते भी अंधे होने लगे तब चश्मा भी किसी महापुरुष ने चला दिया। मुझै नहीं जानता मैं पाखंडप्रिया अभी श्वेत द्वीप से चली आती हूँ, मैं फणीश की बहिन हूँ, देख बिना चश्मा के तू देख लेगा कि मैं कैसी हूँ और मेरा रूप कैसा आश्चर्यमय है। भाग जा नहीं तो - हाँ तमाशा बताऊँगी।'' मैंने कहा, ''हा दैव! किस आपत्ति में तूने मुझै डाला।'' झट श्यामा का स्मरण किया और ज्यौंही गंगा सागर संगम में डुबकी लगाई पाप कट गए सब भ्रम नाश हो गया। रेल का खेल विला गया फिर भी वही श्यामा और मैं - फिर भी वही पर्वत और नदी - और फिर भी वही चाँदनी की रात - रात के दोपहर बीत चुके थे, तीसरा पहर था।
- ८चौथा प्रहर रात्रि का लगा, यह धर्म का पहरा था। स्वप्न की डोर अभी तक नहीं टूटी तौ भी क्या का क्या हो गया। अब भोर होने लगा। तमचोर बोल उठा, मोर भी रोर करने लगा। मंद मंद वायु चलता था मैं तो घोर निद्रा में मग्न था। भैरवी रागिनी सज के आ गई। गैवैयों की छेड़ छाड़ मची। धर्म की बेल फिर भी लहलहानी। चकई की कहानी पूरी भई। प्यारे चकवा से पंख फटकार और परो को चोंच से निरुवार चली मिलने। संयोगियों को काल सी प्राची दिशा दिखानी लगी।


