श्यामास्वप्न
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गजराज सी चाल – गले में चमेली की माल – बड़ी चतुर पर मदनातुर -गंगाजमुनीवाल – तौभी मन्मथ के जाल को लिए – ‘’मिस्सी के वदनामी का पर खोसे’’ – अधरों को द्विजों से दबाए – दाँतोंकी बत्तीसी खिलाए सुमार्गसे कुमार्ग पहुँचाने की मशाल – दुष्टपथ की परिचारिका, विलासियों की सहचारिका – द्रव्यके लिए तन और मन की हारिका – सुमतिवाली बालाओं के मन में कुमति की कारिका – ‘बुढ़ियाबखान’ सी पुस्तकों की सारिका – अपने भक्तों पर जीवन की हारिका – अच्छे अच्छे कुलों का चौका लगानेवाली-अभिसारिकाओं की नौका – ऐसी प्रगल्भ मानौ डौका – मदनपाठशाला की बालाओं को परकीयत्व धर्मशास्त्र सिखाने की परिभाषा – ‘परपतिसंगम’ रूप को कंदर्प व्याकरण से सिद्ध कराने वाली – रति वेदांत की परिपाटी सिखानेवाली – सुमति-लोप-विधायक सूत्र को कंठ करानेवाली – कुपंथसरिता की सेतु – मदनगीता महामाला मंत्र की ऋषि – सुरति सिद्ध कराने की आचार्य – कामानल में हवन कराने को होता -परपुरुष आलिंगनतीर्थ में उतरने की सीढ़ी – संभोग की शिला – स्थूल काय – बलिष्ठ जंघा – सिंदुर रहित माँग – कंकन शून्य हाथ – स्वेत दुकूल पहने – ऐसा स्वाँग किए उसी नववधू के पीछे खड़ी है।
ये सब गुण उसके प्रत्यंग देखने से प्रकट होते थे। ऐसी ही सखी कुलवधू को लकार लोप का आकार बना देती है। ईश्वर इनसे बचावै।
मैंने इनके रूप भलीभाँति अनिमिष नयनों से देखे पर स्वप्न में भी स्मरण न हुआ कि इन्हैं पहले कभी देखा था। बार बार यही कहना पड़ा – ‘अहो मधुरमासां दर्शनम्’ उस एकादश वार्षिकी कन्या का रूप भी विचित्र था। साँवरा मुख-काले नैन और काले चिकुर-वाल्यावस्था की भूमि में मदन किसान ने ऐसा श्रम किया था कि यौवन बीज की अंकुर निकल रहे थे। बालापन में भी चतुराई, कुंद सी हँसी भुराई और चतुराई दोनों सूचन करती थीं, आँखैं अमृत और विष की कटोरी थीं, आँचर यद्यपि सामान्य रीति से नहीं ढाँकती थीं तौ भी किसी-किसी को देख अनेक हाव-भाव करतीं थीं। बालक और बालिकाओं के क्रीड़ा-स्थल पर जाती और कभी किसी को देख मुसकिराकर और लाज बताकर घर में छिप जाती। सब बातैं जो रसीलीं नवोढ़ा जानती हैं – यद्यपि उसे इनका तनिक भी अनुभव न था वह जानती थी, मानौ काम की चटशाल में उसने हाल में रति की परिपाटी ली हो। रस का अनुभव कुछ नहीं तौ भी सुन-सुन के अभी से परिपक्व हो रही थी। रस की बातैं सुन कर ऐसी मुसकिराती कि अधर पल्लव के बाहर मुसकिरान कभी नहीं निकलती। प्रेम की धाँतैं सुन मुँह नीचा कर लेती। फल मूल मिष्ठान्न आदि उसको बहुत अच्छे लगते थे। रजतलोह की चुंबक, मतलब की पूरी, काम की धुरी नेह में जुरी मानौ किसी ने उसी की डुरी से बाँध दिया हो।
तीसरी कन्या, रूप की धन्या, यद्यपि केवल 6 वर्ष की तौ भी कुशल और प्रवीनता की अंकुर सी जनाती थी।
इन दोनों को देख मन में यही उठता कि ‘होनहार विरवान के होत चीकने पात’ जिनके रूप के केवल अवलोकन मात्र ही से इतने गुणों का संभव और अनुमान होना प्रत्यक्ष है तो चरित न जाने कैसे-कैसे होंगे। यही बड़ी देर तक सोचता रहा। जी में आया कि निकट जाकर उस लक्ष्मी का जो ऐसी पश्यन्मनोहरा उस पर्वत के शिखर पर आविर्भूत हुई थी कुछ वृत्तांत पुछैं और सुनैं। इतने ही में ऐसी पवन चली कि विमान डगमगाने लगा कहीं सिर कहीं धड़ कहीं टोपी कहीं जूते रातदिन का ज्ञान चला गया, न जाने किस मंदराचल के खोह में उलूक के समान जहाँ बेप्रमान अंधकार है जा छिपा। निकट जाने का विचार करते ईश्वर ने क्या अनाचार कर दिया कि सोचा विचारा सब नष्ट हो गया। पर यह तो घर की खेती थी। उस फूस ने तो सभी युक्तियाँ बतला ही दी थीं अब कुछ चिंता की बात नहीं थी। मैं ने सोचा कि जहाँ फिर एक गोता लगाया तहाँ ज्ञान और भान का पोता का पोता गगनगंगा के सोता से निकला चला आवैगा फिर कोई सोता भी हो तो जग जाय, पहरे की बात नहीं। इतनी नहरैं कि उसकी लहरैं बड़ा शब्द करती हैं। फिर तो ‘प्रबोधयत्यर्णव एव सुप्तम्’ यह गगनगंगा कहाँ से आई इसका कुछ ठीक पता नहीं लगता। पर सुनते हैं कि महादेव नंगा के जो सदा भंग में मग्न है झंगा से निकलती है पर इसका क्या प्रमाण?
पुराण। पुराण-सुराण क्या? वाहजी! कुराण (पुराण) नहीं जानते। नहीं।
तो अधिक क्या कहैं, गंगा उस नंगा के जटाजूट में छूट कर नाचती है, फिर मर्त्यलोकवासी सत्यानासी उसके कनूकों को लूटकर क्षीरसागर के वासी होते हैं। वहाँ उन्हैं साक्षात् लक्ष्मी जी की झाँकी होती है।
क्या वे वहाँ अकेली रहती हैं?
नहीं रे मूर्ख, क्या तू ने अभी लक्ष्मी को नहीं जाना, वह कभी अकेली रहीं हैं कि रहैंगी, वे बड़ी चंचला हैं। भगवान् शेषशायी श्यामसुंदर के साथ शयन करती हैं। लिखा भी तो है ‘एका भार्य्या प्रकृतिमुखरा चंचला च द्वितीय’ पर क्या हम ऐसी बातैं उस देवी के विषय में कह सक्ते हैं – नहीं नहीं भाई – वह तो हमारी पूज्य है। तौ भी सच्ची बात के कहने में क्या डर, ‘सत्यमेव जयते नानृतम्’ साँच को आँच कहाँ। बस, अब युक्ति सोचने बैठे कि कौन सी युक्ति करैं जिसमें उस अलक्ष्य देवी के दर्शन फिर भी हों और कुछ बातचीत करैं, सोचते सोचते एक बात याद पड़ी पर लिखैंगे नहीं, लिखने की कौन बात कहैंगे भी नहीं। उसी युक्ति से फिर आँख मूदीं और क्षण भर ध्यान किया तो फिर भी उसी के सामने पहुँच गए वही मूर्ति फिर भी नैनों के सामने नाचने लगी। ऊमर के फूल सरीखे दर्शन हुए, उसकी सुंदरता देखते ही मेरी इंद्रियाँ शिथिल पड़ गईं, पलकैं झपने लगीं। हाथ पैर ढीले पढ़ गए मैं तो जक गया। उसी समय मूर्छित हो गिरा जाता था और भूमि ले लेता यदि मेरा हितकारी सेवक मुझे अपना सहारा न देता। उसके कंधे पर अपना सिर डाल कर बैठ गया। आँखैं मुकुलित हो गईं, तन की सब सुधि बुधि जाती रही। गुलाब जल के अनेक छींटे मीठे मीठे मेरे मुख पर सींचे, धीरे धीरे संज्ञा आयी। नेत्र आधे खुले, साँस बहुरी, सिर उठा कर देखा प्रणाम मन ही में किया। हृदय में हाथ जोड़े, इच्छा हुई कि कुछ बोलै और अपना जी खोलै या कहीं को डोले सेवक ने सहारा दिया। बल पूर्वक इंद्रियों को सम्हार सरस्वती को मनाय वचन की शक्ति को तोल बोलने लगा।
‘भगवति तेरे चरणकमलों को प्रणाम है’, इसको सुन भगवती मौन हो रही मैं ने फिर भी कहा –
‘’नारायणि प्रणाम करता हूँ, भला इस दीन दास की ओर तनिक तो दया की कोर करो’’ –
देवी ने देखा, ऐसी दृष्टि की मानो सेतकमल की श्रेणीं बरसाईं हों। केवल दृष्टि मात्र से मेरा प्रणाम ग्रहण किया और अपनी पूर्वोक्त सखियों की ओर निहारी। सखीं सब मुसकिराकर रह गईं। मैं और अचंभे में हो गया सोचने लगा यह कैसी लीला करती है। भला कुछ और इससे पूछना चाहिए। ऐसा मन में ठान फिर भी कुछ कहने को उत्सुक हुआ और निकट जा बोला।
‘’चंद्रमुखी यदि तुझै कष्ट न हो तो कुछ पूछूँ, मेरा जी तुझसे कुछ बात करना चाहता है।’’
‘’भद्र कहो क्या कहते हो, जो इच्छा हो पूछो।’’ ऐसा कह चुप हो गई।
मैंने कहा, ‘’भद्रे – यदि क्लेश न हो तो कहो तुम किस राजर्षि की कन्या हो कहाँ तुम्हारा देश है और इस शिखरपर किस हेतु फिरती हो?’’
उसने कहा, ‘’मेरी कथा अपार है, सुनने से केवल दुःख होगा। कहना तो सहज है पर सुनकर धीरज धरना कठिन जनाता है। ऐसा कौन वज्र हृदय होगा जो उसे सुन फूट फूटकर न रोवैगा – यह मेरी अभागिनी के चरित किसने न सुने होंगे और सुनकर कौन दो आँसू न रोया होगा,’’ इतना कह लंबी साँस लेकर नेत्रों में जल भर लिया। मैं तो सूख गया कि हा देव इस देवी को भी दुःख है क्या ऐसी धन्य और सुंदरी को भी दुर्भाग्य ने नहीं छोड़ा। वाह रे विधाता तेरा विधान धन्य है। धिक्कार है तुझै जो तूने इस पुण्यात्मा जीव पर भी दया न की। न जाने यह अपनी कथा कह कर कौन कौन विष के बीज बोवैगी और क्या क्या हाल कह कर बेहाल करैगी। फिर भी ढाढ़स बाँध बोला।
‘’सुंदरी मैं बहु शोकग्रस्त हुवा क्या मैंने तुम्हैं कष्ट तो नहीं दिया। जान पड़ता है कि पूर्व दुःख के घटा फिर से हृदय गगन पर छा गए। तो अब कही देना भला है क्योंकि ‘विवक्षितं ह्यनुक्तमनुतापं – जनयति’ और भी किसी परिचित या सज्जन के सामने जो दुःख और सुख का समभागी हो कहने से दुःख बट जाता है।
‘’स्निग्धजनविभक्तं हि दुःखं सह्यवेदनम्भवति।’’ ‘’स्वजनस्य हि दुःखमग्रतो विवृतद्वारमिवोपजायते।’’
‘’मुझे अभागिन की कहानी भी क्या किसी को सुहानी है परंतु तुम्हारा यदि आग्रह है तो सुनो। मैं शुद्धभाव से तुम्हारे सन्मुख सब यथास्थित कहती हूँ,’’ इतना कह कई बार लंबी लंबी सांसैं भर आकाश की ओर दृष्टि कर यौं बोली।
‘’भूमंडल में जो आखंडल के चाप के सदृश गोलाकार है जंबू द्वीप नाम का प्रदीप जो दीपक समान मान को पाता है प्रसिद्ध क्षेत्र है। उसी में भारतखंड में अपने हाथों से बनाया हो वर्त्तमान है। भारतखंड में अनेक खंड हैं पर आर्य्यावर्त्त सा मनोहर और कोई देश नहीं। पृथ्वी के अनेक द्वीप द्वीपांतर एक से एक जिनका चित्र ही मन को हर लेता है वर्त्तमान है पर आर्य्यावर्त्त सी पुण्य भूमि न तो आँखों देखी और न कानों सुनी। इसके उत्तर भाग की सीमा में हिमालय सा ऊँचा पर्वत जो पृथ्वी के मान दंड के सदृश है भूलोक मात्र में ऐसा दूसरा नहीं। गंगा और यमुना सी पावन नदी कहाँ हैं जिनके जल साक्षात् अमृतत्व को पहुँचानेवाले हैं। त्रिपथगा की जो आकाश, पाताल और मर्त्यलोक को तारती है, कौन समता कर सक्ता है। सुर और असुरों के मुकुटकुसुमों की रजराजि की परिमलवाहिनी, पितामह के कमंडलु की धर्मरूपी द्रवधारा, धरातल में सैकड़ों सगरसुतों सुरनगर पहुँचाने की पुण्य डोरी – ऐरावत के कपोले घिसने से जिसके तट के हरिचंदन से तरुवर स्यंदन होकर सलिल को सुरभित करते हैं, लीला से जहाँ की सुर सुंदरियों के कुचकलशों से कंपित जिसकी तरल तरंग हैं नहाते हुए सप्तर्षियों के जटा अटवी के परिमल की पुन्यवेनी -हरिणतिलक – मुकुट के विकट जटाजूट के कुहरे भ्रांति के जनित संस्कार की मानो कुटिल भौंरी, जलदकाल की सरसी, गंध से अंध हुई भ्रमर माला, छंदोविचित की मालिनी, अंध तमसा रहित भी तमसा के सहित भगवती भागीरथी हिमाचल की कन्या सी जगत् को पवित्र करती हुई, नरक से नरकियों को निकारती इस असार संसार की असारता को सार करती है।
भगवान् मदन मथन के मौलि की मालती की सुमन माला, हालाहलकंठ वाले के काले बालों की विशाल जाला, पाला के पर्वत से निकल कर सहस्र कोसों बहती विष्णु से जगत्व्यापक सागर से मिलती रहती है। इसकी महिमा कौन कह सक्ता है। पद्माकर ने ठीक कहा है –
‘’जमपुर द्वारे के किवारे लगे तारे कोऊ हैं न रखवारे ऐसे वन के उजारे हैं। कहै पदमाकर तिहारे प्रनधारे जेते करि अधभारे सुरलोक के सिधारे हैं। सुजन सुखारे करे पुन्य उजियारे अति पतित कतारे भवसिंधु ते उवारे हैं। काहू ने न तारे तिन्हैं गंगा तुम तारे आजु जेते तुम तारे तेते नभ में न तारे हैं॥’’ ‘’लाए भूमिलोक तैं जसूस जवरेई जाय जाहिर खबर करी पापिन के मिश्र की। कहै पदमाकर विलोकि जम कही कै विचारो तो करमगति ऐसे अपवित्र की। जौलौं लगे कागद बिचारन कछुक तौलौं ताके कानपरी धुनि गंगा के चरित्र की, वाके सीस ही ते ऐसी गंगाधारा बही जामे बही बही फिरी बही चित्रहू गुपुत्र की॥’’ ‘’गंगा के चरित्र लखि भाषै जमराज ऐसे एरे चित्रगुप्त मेरे हुकुम में कान दै। कहै पदमाकर ए नरकनि मूदि करि मूदि दरवाजन को तजि यह थान दै। देखु यह देवनदी कीन्हे सब देव याते दूतन बुलाय के विदा के वेगि पान दै। फारि डारि फरद न राखु रोजनामा कहूँ खाता खतजान दै बही को बहि जान दै॥’’
यम की छोटी बहिन यमुना से सख्यता करने से यमराज-नगर के नरकादि बंदियों को मुक्ति कराने में कुछ प्रयास नहीं होता। प्रयागराज में यमुना की सहचरी होकर इस भाव को दरसाती है। इसका समागम इस स्थल पर उनकी श्याम और सेत सारी से प्रकट होता है।
कहूँ प्रभा श्यामल, इंद्रनीली मोती छरी सुंदर ही जरीली। कहूँ सुमाला सित कंज जाला विभात इंदीवरहू रसाला॥1॥ कहूँ लसैं हंस विहंग माला कहूँ सुकाला गुरुपत्र राजै मनो मही चंदन शुभ्र छाजै॥2॥ कहूँ प्रभा चंदहि की विभासै जथा तमौ छाय मिली विलासै। उतै शरत् मेघ-सुपेत लेखा जहाँ लख्यौ अंबर छेद मेखा॥3॥ कहूँ लपेटे भुजगो जु काले, भस्मांग सो शंकर केर भाले। लखो पियारी बहती है गंगा प्रवाह जाको यमुना प्रसंगा॥4॥
इसके दक्षिण विंध्याचल सा अचल उत्तर और दक्षिण को नापता भगवान् अगस्त्य का किंकर दंडवत् करता हुआ विराजमान है। इसके पुण्य चरणों को धोती मोती की माला के नाईं मेकलकन्यका बहती है, यह पश्चिमवाहिनी, जिस्की सबसे विगल गति है, अपनी बहिन तापती के साथ होकर विंध्य के कंदरों की दरी में तप करती, सूर्य के ताप से तापित, सौतों के सदृश अपने बहुवल्लभ सागर से जा मिलती है नर्मदा के दक्षिण दंडकारण्य का एक देश दक्षिण कोशल के नाम से प्रसिद्ध है।
याही मग ह्वै कै गए दंडकवन श्रीराम। तासों पावन देश यह विंध्याटवी ललाम। विंध्याटवी ललाम तीर तरुवर सों छाई। केतिक कैरव कुमुद कमल के वरन् सुहाई। भज जगमोहन सिंह न शोभा जात सराही। ऐसो वन रमनीय गए रघुवर मग याही॥ शाल ताल हिंतालवर सोभित तरुन तमाल। विलसत निंब विशाल इंगुदी अरु आमलकी। सरो सिंसिपा सीसम की शोभा शुभ झलकी। भन जगमोहन सिंह दृगन प्रिय लगत पियाला। वर जामुन कचनार सुपीपर परम रसाला॥ डोलत जहँ इत उत बहुत सारस हंस चकोर। कूजित कोकिल तरु तरुन नाचत जहँ तहँ मोर। नाचत जहँ तहँ मोर रोर तमचोर मचावत। गावत जित तित चक्रवाक विहरत पारावत। भन जगमोहन सिंह सारिका शुक बहु बोलत। बक जल कुक्कुट कारंडव जहँ प्रमुदित डोलत॥ बहत महानदि, जोगिनी, शिवनद तरल तरंग। कंक गृध्र कंचन निकर जहँ गिरि अतिहिं उतंग। जहँगिरि अतिहि उतंग लसत श्रृंगन मन भाए। जिनपै बहु मृग चरहिं मिष्ठ तृन नीर लुभाए। सघन वृच्छ तरुलता मिले गहवर धर उलहत। जिनमें सूरज किरन पत्र रंध्रन नहिं निवहत।
मैं कहाँ तक इस सुंदर देश का वर्णन करूँ। कहीं कहीं कोमल कोमल श्याम-कहीं भयंकर और रूखे सूखे वन – कहीं झरनों का झंकार, कहीं तीर्थ के आका र-मनोहर मनोहर दिखाते हैं। कहीं कोई बनैल जंतु प्रचंड स्वर से बोलता है – कहीं कोई मौन ही होकर डोलता है – कहीं विहंगमों का रोर कहीं निष्कूजित निकुंजों के छोर – कहीं नाचते हुए मोर – कहीं विचित्र तमचोर – कहीं स्वेच्छाहार बिहार करके सोते हुए अजगर, जिनका गंभीर घोष कंदरों में प्रतिध्वनित हो रहा है – कहीं भुजगों की स्वास से अग्नि की ज्वाला प्रदीप्त होती है – कहीं बड़े बड़े भारी भीम भयानक अजगर सूर्य के किरणों में घाम लेते हैं जिनके प्यासे मुखों पर झरनों के कनूके पड़ते हैं – शोभित हैं –
जहाँ की निर्झरिनी – जिनके तीर वानीर के भिरे, मदकल कूजित विहंगमों से शोभित हैं – जिनके मूल से स्वच्छ और शीतल जलधारा बहती हैं – और जिनके किनारे के श्याम जंबू के निकुंज फलभार से नमित जनाते हैं – शब्दायमान होकर झरती हैं।
जहाँ के गिरि विवर के तिमिर से छाये हैं। इनमें से भालुनी थुत्कार करतीं निकलकर पुष्पों की टट्टियों के बीच प्रतिदिन विचरतीं दिखाई देती हैं। जहाँ के शल्लकी वृक्षों की छाल में हाथी अपना वदन रगड़ खुजली मिटाते हैं और उनमें से निकला क्षीर सब वन के सीतल समीर को सुरक्षित करता है।
ये वही गिरि हैं जहाँ मत्तमयूरों का जूथ वरूथ का वरूथ होकर वन को अपनी कुहुक से प्रसन्न करता है। ये वही वन की स्थलीं हैं जहाँ मत्त मत्त हरिण हरिणियों समेत विचरते हैं।
मंजु वंजुल की लता और नील निचुल के निकुंज जिनके पता ऐसे सघन जो सूर्य की किरनौं को भी नहीं निकलने देते इस नदी के तट पर शोभित हैं।
कुंज में तम का पुंज पुंजित है, जिस्में श्याम तमाल की शाखा निंब के पीत पत्रों से मिलीं हैं। रसाल का वृक्ष अपने विशाल हाथों को पिप्पल के चंचल प्रबालों से मिलाता है, कोई लता जंबू से लिपट कर अपनी लहराती हुई डार को सबसे ऊपर निकालती है। अशोक के ललित पुष्पमय स्तबक झूमते हैं, माधवी तुषार के सदृश पत्रों को दिखलाती है, और अनेक वृक्ष अपनी पुष्पनमित डारों से पुष्प की बृष्टि करते हैं। पवन सुगंध के भार से मंद मंद चलती है केवल निर्झर का रव सुनाई पड़ता है कभीं-कभीं कोइल का बोल दूर से सुनाता है और कलरव का कल रव निकटस्थित वृक्ष से सुनाई पड़ता है।
ऐसे दंडकारण्य के प्रदेश में भगवती चित्रोत्पला जो नीलोत्पला की झाड़ी और मनोहर मनोहर पहाड़ी के बीच होकर बहती है, कंकगृध्र नामक पर्वत से निकल अनेक अनेक दुर्गम विषम और असम भूमि के ऊपर से बहुत से तीर्थ और नगरों को अपने पुण्यजल से पावन करती पूर्व समुद्र में गिरती है।
यच्छ्रीमहादेव पदद्वयम्मुहुर्महानदी स्पर्शति वै दिवानिशम्। तदेव तन्नीरमभूत्परं शुचि नवद्वयद्वीपपुनीतकारकम्॥
इसी नदी के तीर अनेक जंगली गाँव बसे हैं। वहाँ के वासी वन्य पशुओं की भाँति आचरण करने में कुछ कम नहीं हैं। पर मेरा ग्राम इन सभों से उत्कृष्ट और शिष्टजनों से पूरित है – इसके नाम ही को सुन कर तुम जानोगे कि वह कैसा ग्राम है।’’ कह चुप हो रही। मैंने कहा, ‘’धन्य है सुंदरी तूने बड़ी दया की जो इतना श्रम कर इस अपावन जन के कानों को ऐसा मनोहर वर्णन सुना के पावन किया। यदि कष्ट न हो तो और सुनावो।’’ देवी मुसकिरा के बोली, ‘’भद्र सुनो कहती हूँ’’ इसकी मुसकिराहट ने मेरे हृदय गगन का तिमिर तुरंत ही मिटा दिया और बोली, ‘’इस पावन अभिराम ग्राम का नाम श्यामापुर है। यहाँ आम के आराम थकित पथिक और पवित्र यात्रियों को विश्राम और आराम देते हैं – यहाँ क्षीरसागर के भगवान् नारायण का मंदिर सुखकंदर इसी गंगा के तट विराजमान है। राम लक्ष्मण और जानकी की मूरतैं सी झलकती हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो अभी उठी बैठती हों। मंदिर के चारों ओर गौर उपल की छरदिवाली दिवाली की शोभा को लजाती है। मंदिर तो ऐसा जान पड़ता है मानो प्रालेय पर्वत का कंदर हो भगवान् रामचंद्र के सन्मुख गरुड़ की सुंदर मूर्त्ति कर कमल जोरे सेवा की तत्परता सुचाती है। सोने का घंटा सोने ही की सौंकर में लटका धर्म के अटका सा झूलता दीन दुःखी दर्शनियों के खटका को सटकाता है। भटका भटका भी कोई यद्यपि किसी दुःख का झटका खाए हो यहाँ आकर विराम पाता है, और मनोरंजन दुःखभंजन-गंजन विलोल विलोचनी जनकदुलारी के कृपाकटाक्ष को देखते ही सब दुःख दारिद्र छुटाता है। राम और लक्ष्मण की शोभा कौन कह सकता है –
‘’शोभा सीवैं सुभग दोउ वीरा। नील पीत जलजात सरीरा॥ मोर पंख सिर सोहत नीके। गुच्छे बिच बिच कुसुमकली के॥ भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवण सुभग भूषण छबि छाए॥ विकट भृकुटि कच घूँघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥ चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मन मोला॥ मुख छवि कहि न जाय मो पांही। जो बिलोकि बहु काम लजाही॥ उर मणिमाल कंबु कल ग्रीवा। कामकलभ कर भुजबल सीवा॥ राजत राम समाज महँ कोशल राजकिशोर। सुंदर श्यामल गौर तनु विश्वविलोचन चोर। शरद चंद्र निदंक मुख नीके। नीरज नैन भावंते जी के॥ चितवनि चारु मार मनहरनी। भावति हृदय जाति नहिं वरनी॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदुबोला॥ कुमुद बंधु कर निंदक हासा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥ भाल विशाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥ पीत चौतनी सिरन सुहाई। कुसुमकली बिचबीच बनाई॥ रेखैं रुचिर कंबु कलग्रीवा। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवा॥ कुंजर मणिकंठाकलित उर तुलसी की माल। वृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु विशाल॥’’
ऐसा सुंदर ग्राम जिस्में श्यामसुंदर स्वयं विराजमान हैं – मेरा जन्मस्थान था। वाग भी राग और विराग दोनों देता है। देवालयों की अवली नदी के तीर में नीर पर परछाहीं फेकती है – ऐसा जान पड़ता है कि जितने ऊँचे कगूरों से वह अंबर को छूती है उसी भाँति पाताल की गहराई भी नापती है – जहाँ विचित्र पांथशाला – बाला और बालक पाठशाला – न्यायाधीश और प्रबंधकों के आगार – बनियों का व्यापार जिनके द्वारे फूलों के हार टँगे हैं जहाँ की राजपथों पर व्योपारियों की भीर सदैव गंभीर सागर सी बनी रहती है चित्त पर ऐसा असर करती है जो लिखने के बाहर है।
चौड़े चौड़े राजपथ संकीर्ण वीथी अमराइयाँ और नदी के तट सब अभिसारिका और नागरों के सहायक हैं! बिलासियों का सहेट अभिसारिकों का झपेट अनंगरंग का लपेट सपत्न जनों का दपेट सबका सब मन को प्रफुल्लित करता है।
पुराने टूटे फूटे दिवाले इस ग्राम के प्राचीनता के साक्षी हैं। ग्राम के सीमांत के झाड़ जहाँ झुंड के झुंड कौवे और बकुले बसेरा लेते हैं गवँईं की शोभा बताते हैं, प्यौ फटते और गोधूली के समय गैयों के खिरके की शोभा जिनके खुरों से उड़ी धूल ऐसी गलियों में छा जाती है मानो कुहिरा गिरता हो। ये भी ग्राम में एक अभिसार का अच्छा समय होता है।
‘’गोप अथाइन तें उठे गोरज छाई गैल। चलु न अली अभिसार की भली सझोखी सैल॥’’
यहाँ के कोविद थरथरी – गोपीचंदा – भोज – विक्रम – (जिसे ‘विकरमाजीत’ कहते हैं) लोरिक और चदैंनी – मीराबाई – आल्हा – ढोला-मारू – हरदौल इत्यादिकों की कथा के रसिक हैं – ये विचारे सीधे साधे बुड्ढे जाड़े के दिनों में किसी गरम कौड़े के चारों ओर प्याँर बिछा बिछा के अपने परिजनों के साथ युवती और वृद्धा बालक और बालक और बालिका युवा और वृद्ध सबके सब बैठ कथा कह कह दिन बिताते हैं।
कोई पढ़ा लिखा पुरुष रामायण और व्रजविलास की पोथी बाँचकर टेढ़ा मेढ़ा अर्थ कह सभों में चतुर बन जाता है, ठीक है।
‘’निरस्थपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते’’
कोई लड़ाई का हाल कहते कहते बेहाल हो जाता है – कोई किसी प्रेम कहानी को सुन किसी के प्रबल विरहवेदना को अनुभव कर आँसू भर लेता है – कोई इन्हैं मूर्ख ही समझकर हँस देता है। अहीर अहिरिनों के प्रश्नोत्तर साल्हो में हुआ करते हैं। यह भोली कविता भी कैसी होती है – अनुप्रास भी कैसा इन ग्रामीणों को सुखद होता है –
‘’देख बुढ़ौंना के गोठ परोसिन मोला कथै चलकोलामा’’
करमा
आमा डार कोइली सुवा बोलै कागा – ध्रुव – पर्रा में लालभाजी छानी मा आदा तोर मुटियारी मजा भेंगै राज’’ – आमा
धानों के खेत जो गरीबों के धन हैं इस ग्राम की शोभा बढ़ाते हैं। मेरा इसी ग्राम का जन्म है। मेरे पिता का वंश और गोत्र दोनों प्रशंसनीय हैं। मेरे पुरुषा प्रथम तो ब्रह्मावर्त्त से उत्कल देश में जा बसे थे। वहाँ बिचारे भले भले आदमियों का संग करते करते कुछ काल के अनंतर उत्कल देश को छोड़ राजदुर्ग नामक नगर में जा बसे। उत्कल देश के जलवायु अच्छे न होने के कारण वह देश तजना पड़ा, ऋषि वंश के अवतंस हमारे प्रपितामहादिक पूजा पाठ में अपने दिन बिताते रहे, कई वर्षों के अनंतर दुर्भिक्ष पड़ा और पशु पक्षी मनुष्य इत्यादि सब व्याकुल होकर उदर पोषण की चिंता में लग गए उन लोगों की कोई जीविका तो रही नहीं, और रही भी तो अब स्मृति पर भ्राँति का जलदपटल छा जाने के हेतु सब काल ने विस्मरण करा दिया। नदी नारे सूख गए, जनेऊ सी सूक्ष्मधार बड़े बड़े नदों की हो गई। मही जो एक समय तृणों से संकुल थी बिलकुल उससे रहित हो गई। सावन के मेघ भयावन शरत्कालीन जलदों की भाँति हो गए। प्यासी धरनी को देख पयोदों को तनिक दया न आई। बिचारे पपीहा के पीपी रटने पर भी पयोद न पसीजा और उसके चंचुपुट में एक बूँद निचोया। इस धरनी के भूखे संतान क्षुधा से क्षुधित होकर व्याकुल घूमने गले। गैयों की कौन दशा कहे ये तो पशु हैं। खेत सूखे साखे रोड़ोंमय दिखाने लगे। शालि के अंकुर तक न हुए किसानों ने घर की पूँजी भी गँवा दी। बीज बोकर उसका एक अंश भी न पाया। ‘यह कलिजुग नहीं करजुग है इस हाथ ले उस हाथ दे’ – इस कहावत को भी झूठी कर दिया अर्थात् कृषी लोगों ने कितना ही पृथ्वी को बीज दिया पर उसने कुछ भी न दिया। छोटे छोटे बालकों को उनकी माता थोड़े थोड़े धान्य के पलटे बेचने लगी। माता पुत्र और पिता पुत्र का प्रेम जाता रहा। बड़े बड़े धनाढय लोगों की स्त्रियाँ जिनके पवित्र घूँघट कभी बेमर्य्यादा किसी के सन्मुख नहीं उघरे और जिन्हैं आर्य्यावर्त्त की सुचाल ने अभी तक घर के भीतर रक्खा था अपने पुत्रों के साथ बाहर निकल पथिकों के सामने रो रो और आँचर पसार पसार एक मुठी दाने के लिए करुणा करने लगीं। जब संसार की ऐसी गति थी तो हमारे पूर्व पुरुषों की कौन रही होगी ईश्वर जानै। मैं न जाने किस योनि में तब तक थी। जब वे लोग राजदुर्ग में आए किसी भाँति अपना निर्वाह करने लगे। ब्राह्मण की सीधी साधी वृत्ति से जीविका चलती थी। किसी को विवाह का मुहूर्त धरा – कहीं सत्यनारायण कथा – कहीं रुद्राभिषेक कराया – कहीं पिंडदान दिलाया और कहीं पोथी पुरान कहा। द्वादशी कर सीधा लेते लेते दिन बीते। इसी प्रकार जीविका कुछ दिन चली। मेरे पितामह पितामह के वंश के हंस थे। उनका नाम अवधेश था। उनके दो विवाह हुए। उनकी दोनों पत्नी अर्थात् मेरी पितामहीं बड़ी कुलीना थीं। एक का नाम कौशल्या और दूसरी का अहल्या था। अवधेश जी को कौशल्या से एक पुत्र हुवा। उसका सब सिष्टों ने मिल कर इष्ट साध वसिष्ठ सा वलिष्ठ नाम धरा। ये मेरे पूज्यपाद परमोदार परम सौजन्य-सागर सब गुणों के आगर जनक थे। कुल काल बीतने पर कौशल्या सुरपुर सिधारी, उस समय मेरे पिता कुछ बहुत बड़े नहीं थे। शोकसागर में डूबे, पर दैव से किसका बल चलता है। थोड़े ही दिनों के उपरांत भगवान चक्रधर की दया से अहल्या को एक बालक और एक बालिका हुईं। बालक का नाम नारद और बाला का गोमती पड़ा। यह वही गोमती मेरे पीछे बैठी है। इस अभागिन के कुंडली में ऐसे बाल वैधव्य जोग पड़े थे कि यह बिचारी अपना सुहाग खो बैठी। इसकी कथा कहाँ तक कहूँगी। अभागिनियों की भी कहानी कभी सुहावनी हुई है? मेरे पिता जब युवा हुए अवधेश जी ने राव चाव से उनका विवाह शारंगपाणि की बेटी मुरला से कराया। शारंगपाणि का कुल इस देश के ब्राह्मणों में विदित है, ‘’यथा नामा तथा गुणा:‘’ अतएव उनका कुछ बहुत विवरण नहीं किया, कुछ काल बीते माता गर्भवती हुई। इस समय मेरे पितामह काल कर चुके थे। अपने नातीपंती का सुख न देख सके अहल्या भी अनेक तीर्थों का सलिल बंद पान करते – अपने तन को अनित्य जान तीर्थाटन में लग गई थी। इसलिए इस समय घर में न थी। नौ मास के उपरांत दशम मास में मेरे पिता के एक कन्या हुई, इसे लोग साक्षात् रमा का रूप कहते थे। यह जेठी कन्या थी। इसके अनंतर एक कन्या और हुई। उसका नाम सत्यवती पड़ा। फिर कई वर्षों में भगवान् ने एक सुत का चंद्रमुख दिखाया। सब भवन में उजेला छा गया। गाजे बाजे बजने लगे जो कुछ बन पड़ा दान पुण्य भिखारी और जाचकों को दिया। पुन्नाम नरक के तारने वाले बालक ने मेरी माता की कोंख उजागर की। पर हाय मेटन हितु सामर्थ को लिखे भाल के अंक’ – विधाता से यह न सहा गया। सुख के पीछे दुःख दिखाया – अर्थात् कुटिल काल ने इसे कवल कर लिया।
‘’धिक धिक काल कुटिल जड़ करनी। तुम अनीति जग जाति न वरनी॥’’
माता बिचारी डाक मार मारकर रोने लगी। घर में छोटे बड़े और टोला परोसियों के उत्साह भंग हो गए। जितने लोग पहले सुखी हुए थे उस्से अधिक दुःखी हुए। आँसुओं से सब घर भर गया। पिता हमारे ज्ञानी थे, आप भी ढाढ़स कर सबों को जेठे की भाँति प्रबोध किया और बालक का मृतक कर्म्म करने लगे। काल ऐसा है कि दुस्तर दुःख के घावों को भी पुरा देता है। जो आज भी सो कल न रहा। कल्ह सा परसों न रहा। इसी भाँति फिर सब भूल गए – पर पुत्रशोक अति कठिन होता है। पिता के सदैव इसका काँटा छाती में समा गया। कभी सुखी न रहे – इन दानन मितामी को मना कर फिर तो काजल नैनों में मजा हमारी की दशा देख विलाप करने लगते। फिर गिरस्ती में लोग लगे – कुछ काल के के अनंतर उन्हैं एक कन्या और हुई। इसका नाम पत्रिका के अनुसार सुशीला पड़ा सो हे भद्र! देखो यहीं सत्यवती और सुशीला मेरी दोनों भगिनी सहोदरी हैं और मुझ अभागिन का नाम श्यामा है’’ – इतना कह चुप हो रही इस नाम के सुनते ही मेरा करेजा कँप उठा और संज्ञा जाती रही – हाय हाय! कहता भूमि में गिर पड़ा और स्वप्न-तरंग में डूब गया।
इति प्रथम स्वप्न!
अथ दूसरे याम का स्वप्न
कवित्त
आनंद सहित कृष्णचंद्र द्वारका के बीच रुकमिनी जू के महल पर जागे हैं सोय सपने में देखो ब्रजराज ब्रजवासिन के घर घर हाय ब्रजराज को विलाप होय ख्वाब में मिलाप बाढ़ो मदन को दाब बोधा परम प्रलाप हरि हिय में न सके गोय हाय नंद बाबा हाय मैया हाथ मधुबन हाय ब्रजवासी हाय राधे कहि दीन्हो रोय।
ग्रीष्म की रातैं कैसी सुखद होती हैं – पर सुख का समय बात की बात में कट जाता है। चाँदनी खिली थी तारे छिटके थे, दूसरा पहर रात का लग गया था मैं अपनी अकेली सेज पर बाहु का उपधान किए सोता था। श्यामा का ध्यान लगाकर मग्न था, इतने ही में कोई पहरेवाला गा उठा।
अहो अहो वन के रुख कहूँ देख्यौं पिय प्यारे। मेरो हाथ छुड़ाय कहौ वह कितै सिधारो॥
उस ध्यान से विलग हो गया – फिर भी वही मोहिनी मूरति सामने दिखाई दी। मैं तो उसे देखते ही भूमि पर गिर पड़ा था। अब कुछ संज्ञा हुई सेवक ने धीरज धराया। मुझै बहुत समझा बुझा कर अपने आप में लाया और बोला –
‘’यह किस बखेड़े में पड़े – महाराज – सचेत होकर इसकी मनोरंजनी कहानी को जो पूरी सुनिए। यह क्या बात थी जो आपको उसका नाम सुनते ही मोह और मूर्छा आ गई।’’
मैंने कहा – ‘’मुझै भी इस मोह का कारण नहीं ज्ञात हुआ कि अकस्मात् क्यों ऐसा हो गया था’’ –
इतना कह मैंने श्यामा की ओर देखा। उसका मुख भी मलीन पड़ गया था। इसको देख मुझे और भी शंका हुई कि यह क्या विचित्र लीला है। भला मैं तो ऐसा हो गया पर यह भोली किस भ्रम में पड़ी है। हृदय के शोक को रोक पूछा –
‘’सुंदरी तुम्हारी यह क्या दशा है – तुम क्यौं मलीन पड़ती जाती हौं’’ –
श्यामा ने कहा, ‘’कुछ नहीं, इसका सब वृत्त तुम आप धीरे धीरे जान जावगे। केवल चित्त लगाकर सुनौ, भला तुम क्यौं निःसंज्ञ हो गए थे – ‘’
‘’क्या जानूँ यह क्या मुझै हो गया था – पर अब सुनता हूँ कहिए’’ इतना कह मैं चुप हो गया।
श्यामा बोली, ‘’जब मैं छोटी थी मुझै माता पिता बड़े लाड में रखते थे – उनके कोई पुत्र न रहने के कारण मैं उनके नेत्रों की पुतरी थी और वे लोग मुझै सदा हाथ ही पर धरे रहते थे, रात दिन मेरे लालन और पालन ही में लगे रहते। थोड़े दिनों पर मेरे प्रथम के संस्कार करके मुझै मेरे माता पिता ने एक बाला पाठशाला में विद्याउपार्जन के हेतु भेज दिया। यह पाठशाला ग्राम के कारन बहुत भारी न थी – तौ भी 20 या 25 बालिकाओं से कम प्रति दिन इस शाला में पढ़ने को नहीं जातीं थीं। मेरे साथा अनेक बाला पढ़तीं थीं पर ईश्वर की दया से मैं इतने शीघ्र पढ़ गई कि मेरी बराबरी पुरानी विद्यार्थिनी भी न कर सकीं। हाँ – एक तो मालती और एक माधवी मेरी सहपाठिनी थीं। उनसे मेरा निरंतर स्नेह बना रहता, और एक दूसरे के घर उठने बैठने उत्सवों में और सहज रीति पर भी आया जाया करतीं। जब मैं पढ़ लिख चुकी पाठशाला को छोड़ घर बार के काम में तत्पर हुई और मेरे पिता ने मेरे विवाह की चिंता की। धनहीन होने के कारण कोई कुलीन ब्राह्मण नहीं मिला और मिला भी तो मुझ दीना का पाणिग्रहण करने को उपस्थित न हुआ। मेरे पिता की चिंता बढ़ी और उनने इस्का उद्योग किया। मेरे पिता यहाँ के विख्यात प्रतिष्ठित परिब्राजक राजकुल के मान्य कार्य्याध्यक्ष थे। उस कुल का नाम इस देश की पुरानी बुरी परिपाटी के अनुसार कपटनाग था। मैं नहीं जानती इस बड़े कुल का ऐसा बुरा नाम क्यौं पड़ा। इसका वृत्तांत न तो मैंने कभी पूछने की इच्छा रक्खी और न कभी मेरे पिता ने मुझसे कहा इसी से मुझे नहीं ज्ञात है – पर नाम से कुछ प्रयोजन नहीं। कुल देखना चाहिए। अभी तक पाटलीपुत्र के एक मुख्य नवाब के कुल का नाम ‘नवाब गदहिया’ है। कटपनाग का कुल इस देश में बड़ा मान्य और पूज्य था। इसकी गद्दी पुराने महाराजों के समय से अखंडित चली आती थी और इसमें अनेक पहुँचे पुरुष भी हुए। ए एक चालीसी के अधिपति थे। वहाँ से मेरे पिता ने बहुत कमाया था। और सामान्य रीति पर भोजन आच्छादन की कुछ कमती नहीं रहती थी।
इसी ग्राम में एक सुंदर कुलीन क्षत्रियवंश के अवतंश भी यहाँ के अधिपति थे। इनका लांछनरहित कुल देश देशांतरों में प्रसिद्ध था और इनकी बात का प्रमाण था। इनके माता पिता का हाल मुझै कुछ भी ज्ञात नहीं पर ये विद्या के सागर – सब गुणों में आगर – काव्य में कुशल – बल में प्रबल – नवल नागर लंबे बाहु – प्रशस्त ललाट काले काले नेत्र – काली कालीं भौहैं – गेहुँआ रंग – चतुराई के सदन – इसी ग्राम में बहुत काल से बसते थे। रात दिन पठन-पाठन में इनका चित्त रहता। काव्यकला ने हृदय का कपाट खोल दिया था। ये सब बातैं इनके ललाट ही से जान पड़तीं थीं। सुडौल अंग अनंग के आलय थे। चिकने और काले काले बाल युवतियों के मन को काल थे। मधुर मधुर बोली हमारी हमजोली के मन को नवनीत सरीखा पिघला देती थी। इनकी चितवन से प्रेम और विश्वास प्रकट होते थे। बड़े गंभीर और धीर-नीर के सदृश स्वच्छ निष्कपट चित्त असंख्य वित्त के आगार – मुझै बहुत भले जनाते थे। कोमल कमल से कर – छोटी छोटी दाढ़ी और मूछैं जवानी के आगम को सुचाती थी, विद्या और कविता तो इनके जिह्वा पर नाचती थी और इस दोहे को सार्थ करने वाले इनमें सभी गुण थे –
‘’तंत्रीनाद कवित्त रस सरस राग रति रंग। अनबूड़े बूड़े तरे जे बूड़े सब अंग – ॥’’
देश देशांतर के पंडित और गुणी इनका नाम सुयश और दातृत्व सुन स्वयं आते और उनका यथोचित कालानुसार मान पान भी होता। इनका नाम श्यामसुंदर था। इनकी वय केवल 26 वर्ष की थी। ये हमारे पड़ोसी थे। और मुझसे इनकी कुछ कुछ जान पहिचान भी रही। इस समय मेरी भी वय ठीक 14 की थी पर विद्यालाभ के कारन सभी बातैं कुछ कुछ समझ लेती थी।
श्यामसुंदर मेरे परोसी होने के हेतु दिन में दो चार बार भेंट करते। मै भी उन्हैं अपना हितू और सहायक जान प्रायः बोलचाल करती थी। एक दिन प्रातःकाल को जब मैं स्नान करके अपने अटा पर चढ़ी बाल सुखा रही थी श्यामसुंदर अपने कविताकुटीर के तीर बैठा कुछ बना रहा था। मुझै नहीं मालूम क्या लिखता था। द्वार पर लता छाई थी और उसके पता के फैलाव से उसका मुख कुछ ढका और कुछ प्रकट था, ऐसा जान पड़ता था कि उस मंडप में अकेला गुलाब का फूल खिला हो। मैं उनकी ओर सहज भाव से देखने लगी। वे नीचे मस्तक किए कुछ गुनगुनाते थे। कभी ऊपर देख कुछ लिख लेते और फिर कुछ सोचने लगते – मैं तो उनके स्वभाव को भली भाँति जानती थी – मैंने जान लिया कि वे कुछ कविता करते होंगे। एक बेर और मैंने उनको भली भाँति देखा और अचानक उनकी भी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। वे मेरी ओर एक टक देखने लगे और मैं भी अनिमिष नैनों से उन्हैं निहारती रही।
‘’भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहु सकुचि निमि तज्यो दृगंचल॥’’
यद्यपि मैं उन्हैं प्रतिदिन देखती थी तो भी उस दिन उनके मुखारविंद की कुछ और शोभा रही मैंने भी उनके निहारने से जान लिया कि वे भी आज मुझै किसी और भाव से देख रहे हैं। तौ भी मेरा जी विश्वस्त था। मैं उनके स्वभाव को जानती थी और परिचित भी थी। मैंने और कोई चेष्ठा नैन या कर से नहीं की, स्तब्ध सी वहीं खड़ी रही, पर हृदय में उस समय अनेक प्रकार के भाव आए, कुछ लज्जा भी हुई दृष्टि नीचे कर ली। फिर सिर उठा कर उसी जगन्मोहन को देखा। उनको देखकर मुसकिराई। वे भी मेरे हृदय के भाव अपने हृदय में गुन मुसकिरा गए। मेरी बहिनें सत्यवती और सुशीला यद्यपि मेरे साथ वहीं थीं पर कुछ न समझ सकीं – हाँ, वृंदा जब आई मेरी तन की बुरी दशा देख पूछने लगी।
‘’श्यामा – आज तेरे शरीर की यह दशा कैसी हो गई। तू तो कभी इतना बिलंब अटा पे नहीं करती थी आज क्या हो गया। देख मुझसे मत छिपावै, मैं सब अंत में जान ही जाऊँगी’’ – इतना कह उसने मेरी ओर देख श्यामसुंदर की ओर देखा।
‘’कुछ तो नहीं – मेरी क्या गति होगी। जो गति रोज की सोई आज की। विशेष आज क्या हुआ जो पूछती है’’ – इतना कह मैं अचंभे में आ उसकी ओर देखने लगी।
‘’सुन श्यामा – आज तेरे मुख पर कुछ और पानी है। केश छूटे और आँखैं लाल सजल सी दिखाई देती हैं – तन बदन की सुधि है कि नहीं। देख आँचर कहाँ और सिर का घूँघट कहाँ है’’ – वृंदा ने कहा।
मैं इस व्यवस्था को सच्ची जान लज्जित हो गई पर जहाँ तक बन पड़ा लाज को लुकाया और उत्तर सोचने लगी। उत्तर सोचने में तो सब भेद खुल हो जाता। झपट कर सुशीला को गोद में उठा चिढ़ी हुई सी बातैं करने लगी, ‘’अभी गिर परती तो क्या होता इसी के मारे तो मैं कभी अटारी पर ज्यादा देर नहीं लगाती यह बुरी कही नहीं मानती जब देखो अटा के बाट ही पर बैठती है। गिर परेगी तो खाट पर धरी धरी रोवैगी,’’ इतना कह सुशीला के गाल पर एक चटकन जड़ी कि वह रोने लगी। वृंदा ने झट उसे मेरी गोद से ले लिया और चूम चाट उसे खूब सा पुचकारा। मेरी ओर तिउरी चढ़ा और नाक को सकोर ‘क्यों मार दिया’ ऐसा कह लंबी हुई। अपने प्रश्न का उत्तर भी न लिया। मैंने जाना बलाय टरी, अच्छा हुआ। सत्यवती के साथ वृंदा के पीछे ही उतर गई।’’
मैंने टोका, ‘’बाह री श्यामा 14 वर्ष में जब तुम इतनी चतुर थीं तब आगे न जाने क्या हुआ होगा। पर ढिठाई क्षमा करना मैं शुद्धभाव से तुम्हारी बुद्धिमानी की प्रशंसा करता हूँ फिर क्या हआ’’ – श्यामा ने उत्तर दिया, ‘’दिन दिन नूतन नूतन शाखा वृक्ष से निकली। उस दिन वृंदा चुप रही। न जाने सचमुच भूल गई वा चतुराई से उसको भुलावा सा दे भुलाये रही, पर कभी कई दिनों तक उस प्रश्न की चर्चा तक ओठों पर न लाई। श्यामसुंदर तो फिर उस समय सब बातें ताड़ गया और मुसकिरा कर हट दिया। मध्याह्न के समय उसने सत्यवती को बुलाकर बहुत प्रीति दिखाई। फलादिक भोजन कराए और नवीन वस्त्र देकर एक सादी सी अँगूठी सत्यवती को दी। सत्यवती अपना भाग खुला जान बड़ी प्रसन्न हुई। घर आ पिता जी से सब कहा। श्यामसुंदर की उदारता कौन नहीं जानता था। दादा भी प्रसन्न हुए, और हम लोगों के श्यामसुंदर से समागम करने में तनिक रोक टोक नहीं करते थे। वरंच और भी हम लोगों को उनके पास आने जाने और गुण सीखने की आज्ञा दी। हम लोग सबके सब जब घर के काम से अवकाश मिलता उनके घर आया जाया करते। श्यामसुंदर ने बड़ी दया और मया दरसाई। हम लोगों की दरिद्रता दूर कर दी। हम लोगों का कई बार बुला चुला के न्यौता करते अनेक भाँति की कथा सुनाते और अनेक गुन और कला भी कभी कभी बताते। काव्य और नाटकों की छटा बताई। सिद्ध पदार्थ का विज्ञान दरसाया। रेखागणित और बीजगणित की परिपाटी सिखाई – मानो मेरे हृदय में विद्या का बीज बो दिया। चित्रकारी पर भारी वक्तृता करी। सरगम का भाव बतलाया। मेघ और इंद्र की विद्या सिखाकर इन्हों के सजीव पुरुष या महेंद्र होने का भ्रम मिटाया। मैं बिचारी क्या जानूँ – ए सब बातैं। यद्यपि ये सब बातैं उन्होंने किसी विशेष पुस्तक से नहीं पढ़ाई तौ भी जब जब उन्हैं अपने काम धाम से समय मिलता मेरे शून्य और अँधेरे हृदय में ज्ञान का बीज और दीप स्थापन करते। जितने विषय मैंने श्यामसुंदर से सीखे उतने पाठशाला में भी सीखे थे। हमारी शाला के गुरु यद्यपि बड़ी कृपा करके सिखाते तौ भी मुझे इतना चाव उनके मुख से कोई बात सीखने में नहीं हुआ। जब श्यामसुंदर कोई विद्या का विषय कहता उसके मुख से मानो फूल झरते थे। जब कोई मेघदूत सा काव्य या शकुंतला सा नाटक सुनाता मेरे कानों में अमृत की धारा सी चुवाता। वृंदा भी मेरे साथ रहा करती और उसे मुझसे अधिक उनकी बातों को सुन रस का अनुभव होता। वह तो कभी-कभी छेड़ भी दिया करती थी पर सत्यवती और सुशीला खेल में लगीं रहतीं थीं। यह बात नैसर्गिक है। इतनी थोरी उमरवालीं लड़कीं ऐसी ऊँचीं बातों में मन नहीं लगा सकतीं। यह उमर ऐसी ही है जिसमें सिवाय खुनखुना लट्टू-गुड़ियों के और कुछ नहीं सुहाता।
जब जब मेरी और उनकी चार आँखैं होतीं मेरा बदन कदंब का फूल हो जाता – आँखों में पानी भर आता और तन में पसीने के बूँद झलक उठते। जाँघैं थरथरा उठतीं बदन ढीले पड़ जाते और वसन शिथिल हो जाते थे। श्यामसुंदर भी कभी कभी कहते कहते रुक जाता – रसना लटपटा जाती। और की और बात मुँह से निकल परती। फिर कुछ रुक कर सोचता और कथा की छूटी डोर सी गह लेता। चकित होकर वृंदा की ओर देखता कि कहीं उसने यह दशा लख न ली हो। पर वृंदा बड़ी प्रवीन थी। बीच बीच में मुसकिरा जाती। सत्यवती भी कभी कभी कान देकर कोई कहानी सुना करती। ऐसे समय प्रतिदिन नहीं आते थे पर जब जब बैठक होती तीन चार घंटे के कम की कदापि नहीं होती थी। क्या करे श्यामसुंदर को अपनी जमीदारी के कारबार से इतना अवकाश मिलना दुस्तर था। धीरे धीरे उसका प्रेम बढ़ चला मेरे जी में प्रतिदिन प्रेम का अंकुर जम चला सोचने लगती कि कब उसे देखूँ। जब तक वह अपने कुटीर में बैठता किसी न किसी व्याज से मैं उसे देख लेती। वे भी मेरे लिए मेरी देहली पर दीठि दिए ही रहते। मेरे पैर की आहट को सुन तत्क्षण पलक के पाँवड़े बिछा देते। मेरे मुख को देख चकोर से प्यारे नैनों को बुझाते – पर यह सब ऐसी गुप्तता से हुआ कि घर के बाहर के वरंच परोसी भी कभी न जान सके। हाँ सेवकों के कभी कभी कान खड़े हो जाते – क्यौं कि रात दिन का झमेला एक दिन खुल ही पड़ता है – ‘’अति संघर्ष करै जो कोई। अनल प्रकट चंदन से होई॥’’ – यह कहावत है। माता पिता का कुछ इस बात पर लक्ष्य न था – और मेरा भी मन का भाव अभी तक स्वच्छ था, पर बीज इसका बोया गया था और अभिनव अंकुर भी निकल चुके थे। मैं यद्यपि उनसे ढीठ थी तौ भी मान्य और पूज्य शब्दों को छोड़ कभी और प्रकार के वचन न कहे। उनका काम सब काम को छोड़ करती। जब कभी वे प्यासे होते और अपनी दासी को भी इंगित करते तो मैं ही उठकर शीघ्र उनको जल ला देती। ईश्वर जाने वे उस जल को अमृत या अमृत का दादा समझते थे, पर उनके प्रति रोम से यही प्रकट होता कि वे प्रेम के पथिक और मुझ पर दयालु हैं।
इस प्रीति की रीति को कहाँ तक कहूँ। यह दइमारी साँपिन सी काटती है किसी मंत्र में सामर्थ नहीं कि इसका विष उतारै। एक दिन श्यामसुंदर भोजनोत्तर अपनी शय्या को सनाथ कर रहे थे कि सत्यवती किसी काम के लिए उनके पास ठीक दुपहर को गई और उनकी आज्ञा से उन्हीं के निकट बैठ गई। कुछ काल तक इधर उधर की बातैं हुईं, फिर उन्होंने मेरी चर्चा निकाली। सत्यवती बहुत कम बोलती थी। उन्होंने जो जो बातैं उस्से पूछीं उनका यथार्थ उत्तर न पाया क्यौंकि सत्यवती एक तो इतनी पुष्ट बुद्धि की न थी और दूसरे उसको लाज भी थी। हँसकर रह जाती। हार मान श्यामसुंदर ने एक दोहा मुझे लिख भेजा। वह यह है –

