श्यामास्वप्न
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जो बाला अलि कुंतलन अँगुरिन सों निरुवार। सो चुराय कै मो हियो गई कटारी मार॥
इस दोहे को उनने बड़े डर के साथएक कागद के टुकड़े पर लाल लाल अक्षरों से लिखा और कमल के कोप में रखकर सत्यवती के हाथ भेज दिया। सत्यवती ने मेरी माता मुरला के समक्ष देकर कहा, ‘’जिजी! इस कमल का छतना कैसा पीला है टुक देख तो सही’’ इतना कह नैन मटकाए। मैंने पूछा ‘’यह कहाँ से लाई है?’’ उसने कहा, ‘’श्यामसुंदर ने बड़ी कृपाकर यह फूल तुझे भेजा है और मुझसे कहा कि श्यामा को देकर यह कहना कि ‘’यह मेरा हृदय कमल का कोष है मैंने श्यामा को समर्पण कर दिया है’’ इतना कह चुप हो गई। मैंने जान लिया कि इसमें कुछ कारण है, और फूल को ले जाकर अपनी उसीसे की गदिया तरे दबा दिया और फिर अपने घर के कारबार में लग गई। माता कुछ ध्यान न देकर कुछ और कृत्य करने लगी। मैंने स्नान किए। तुलसी की पूजा कर हुलसी, भोजन कर शयनागार को गई। घर के संकीर्ण होने के कारन जिस कोठरी में मैं सोती थी उसी में पोथी पत्रा और लेखन के साधन धरे रहते थे। गरीब का घर कहाँ तक अच्छा हो। चित्त में तो फूल की समानी थी देह आनंद के मारे फूली सी जाती थी और यह तरंग उठै कि श्यामासुंदर के ‘हृदय कमल के कोष’ को देखूँ तो सही क्या है। उन्होंने तो ‘समर्पण’ ही कर दिया है। इस रूपक को घरवालों ने नहीं समझा था। जिस समय सत्यवती फूल लाई और श्यामसुंदर के कहे को कहा मेरे मन में तो चटपटी समानी थी। मैंने झटपट कमल को उठाया। बदन कदंब हो गया। पत्तों को टार के कोप में देखती क्या हूँ कि एक पाती जो प्रेम रस की काती थी लपेटी हुई धरी है। मैंने उसे –
‘’कर लै चूमि चढ़ाय सिर हिय लगाय भुज भेंट। प्रियतम की पाती प्रिया बाँचत धरत लपेट॥’’
मैंने उसके भीतर का दोहा पढ़ा। कई बार पढ़ा। पढ़ते ही पीरी पर गई और मन में जान गई कि मैं उनके नैनबानों का निशाना हुआ चाहती हूँ। हुआ क्या चाहती हूँ होई गई। मेरे तन में अतन का भाव कुछ कुछ आ चला था – यद्यपि मुग्धता बनी रही तौ भी ज्ञान की ढलक आ गई थी, इसी से सब कुछ थोड़ा थोड़ा समझ जाती। इस अनेक भाव उपजे एक मन हुआ कि पत्र का उत्तर लिख दूँ फिर एक मन हुआ कि न लिखूँ। अंत में श्यामसुंदर के विश्वास और प्रेम ने मुझसे लिखवा ही लिया और मैंने अपनी सीधी साधी मति के अनुसार एक पत्र लिखा जिसे मैं तुमसे कहती हूँ –
‘’आप ने जो लिखा सो सब ठीक है, पर प्रीति सदा निभा ले जाना। हमने क्या अपराध किया जो तुमने हमको फिर दर्शन नहीं दिया। अब हमारे अपराध को क्षमा कीजिए आप का पठन-पाठन देख हृदय प्रफुल्लित हो जाता है। विद्या सीखना ही अधर्म है घर का काम न करै तो हँसी जाय। मैं तुमको कहीं न कहीं से देख ही लेती हूँ। यद्यपि… घात लगाए रहते हैं पर क्या करैं, बिन देखे चैन नहीं पड़ता। कहीं न कहीं से आपके दर्शन हो ही जाते हैं तुमने मेरा जो भी उपकार किया उसको जनम भर नहीं भूलने की। मेरा सब अपराध क्षमा करना। द्वापर कृष्ण की लिखी।
तुम्हारी
श्यामा’’
इस पत्र को लिखकर लौट के बाँचा भी नहीं और यह भी नहीं देखा कि क्या भूल चूक हुई। मैं लिखते समय अपने को भूल गई थी – इसी से दुबारा भी नहीं बाँचा। झटपट सत्यवती को देकर कहा इसे ले जा। वह भी शीघ्र ही लेकर श्यामसुंदर के हाथ में दे आई। श्यामसुंदर ने कहा, ‘’इसका उत्तर पीछे भेजूँगा अभी तू जा’’ -सत्यवती लौट आई। श्यामसुंदर बाँचकर आनंदमग्न हो गए। कई बार मेरे अक्षरों की बनावट देखी। मैं कुछ बुरा नहीं लिखती थी पर श्यामसुंदर को नहीं पाती। दस बेर मेरी पाती उन्होंने फेर फेर बाँची, और न जाने क्या क्या कविता की। उन्हें कविता की बिमारी थी। मैं उसे बहुत नहीं समझती – इसी से उनने मुझै सदा सीधे साधे पत्र लिखे। मुझै जब वे पत्र लिखते या तो रात को जब किसी की बात भी न सुनाती – और या तो बड़े प्रातःकाल संध्यावंदन के उपरांत पर उनकी लगन मुझ पर लग गई। यद्यपि कई मास तक उनने अपनी मनोवांछा ढाँक रक्खी थी तौ भी मैं उनकी बोल चाल, डीठि, रहन बतरान और हँसन से सब कुछ जान गई थी पर मैं मौन रही। मान गहि लिया और मन चाहता कि कुछ और कहै पर लाज और स्वभाव के वश कुछ नहीं कह सकी। एक दिन वे अचानक मेरे द्वारे आन कढ़े। मैं अपनी अटा पै ठाढ़ी रही – वे मो तन देख हँस पड़े। पर मैं लाज के मारे भौन के भीतर भाज गई। उसी दिन से इन कुचाइन चवाइयों ने मिलि के चौचद पारा। मैं क्या करूँ इस विषय को जभी मन में करो तभी अलहन हो जाता है। मैंने बहुतेरा चाहा कि छिपै पर नर्म सखियाँ कभी कभी ताना मार ही देतीं थीं। नहाते, आते, जाते सभी मुझे वंक दृष्टि से देखतीं – पर मैं जान बूझ कर अजान बन जाती – पर वे क्या इस बात को न समझ जातीं होंगी। इस गाँव में एक से एक पड़ीं थीं। अब सुनिए दूसरे ही दिन नौ बजे दिन को सुशीला के हाथ सत्यवती को बुलाकर मेरे पत्र का पलटा उन्होंने दिया। मैंने अपने धन्य भाग मनाए, और उसे पढ़ने लगी। उसमें यह लिखा था –
‘’आज पहिला दिन है कि मैं तुमको लिखता हूँ इसी से भूलचूक होगी क्षमा करना। पहले तो मैं इसी बात में अटक गया कि तुम्हैं क्या कह के लिखूँ। जो मैं तुमको भली भाँति जानता हूँ और बहुत दिनों की परिचय भी है तो भी एकाएक तुम्हैं जैसा जी चाहता है लिखने में सकुच लगती है पर मुझे विश्वास है कि तुम सब समझ लोगी, और भी इसका ब्यौरा निपटाना तुम्हारा ही काम रहैगा। जब तक मुझै तुम आप लिख कर कोई राह न बताओगी मैं तुम्हैं सामान्य रीति पर ही लिखूँगा। तो बस – तुम्हारे पत्र के पढ़ते ही मैंने तुम्हारी बुद्धि की सराहना की मुझे आशा न थी कि तुम पहली ही बेर इस ढिठाई के साथ लिखोगी पर वह मार्ग ही ऐसा है कि कोई क्या करै। तुम्हारा पत्र तुम्हारे अंतरंग और मनोगत का सच्चा प्रमाण है। इस विषय में मुझै और कुछ नहीं कहना क्यौंकि तुमसे परिचित सुजन से और ढिठाई का कहना मेरा ही अपराध गिना जाएगा – ढिठाई – हाँ ढिठाई तुम न करोगी तो कौन करेगा और भी जितना अवकाश तुम मुझै कहने का दोगी उतना ही मैं भी कहूँगा – क्यौंकि ‘’जहाँ तक खाट होगी पाँव भी वहीं तक फैलेंगे’’ – यह तो रहै – पर ‘प्रीति’ – हाँ – ‘प्रीति’ – इसके क्या अर्थ – और ‘निवाहने’ के क्या अर्थ है, यह जरा मुझै बतावो। ये दोनों शब्द मैंने आज तक किसी शब्दवर्ण में भी नहीं पाए।
तुम तो अवश्य ही जानती होगी तभी तो तुमने इन्हैं लिखा भी है, पर जब तक तुम इन शब्दों के लक्षण न बतावोगी मैं कुछ उत्तर नहीं दे सकता। आज तक मैंने जो ‘प्रीति’ के अर्थ समझे हैं वे ये हैं ‘प्रीति’ के अर्थ ‘टेढ़ी’ और ‘निवाहने’ के अर्थ ‘अनहोनी’ के हैं यदि तुम्हारे कोष में भी यही अर्थ हों तो मेरे अर्थ को पुष्ट करो नहीं तो स्याही फेर देना। मैं अपनी छोटी समझ से उस तुम्हारी पंक्ति का छोटा सा उत्तर देता हूँ के ‘’यह सब तुम्हारे ही हाथ है।’’ सत्यवती के हाथ जब मैंने तुम्हैं कमल भेजा था तब उसने क्या कहा – याद है? उसने कहा होगा कि ‘’यह – ने हृदय कमल का कोष, तुम्हैं समर्पण किया है’’ – क्यौं – यही बात है न – यदि यही हो तो इसको समझ लेना, मुझसे अधिक नहीं लिखा जाता। मेरा हाथ कुछ और लिखने में काँपता है। क्षमा करना।
‘’हमने दर्शन नहीं दिए’’ – ठीक है तुम्हारे आज कल दिन हैं कह लो जो चाहो, पर उस दिन कौन था जो चार घड़ी तक… के पास खड़ा रहा और आपने एक-बार भी आँख उठाकर नहीं देखा। क्या जाने आप न रहीं हों, तो बस यह मेरी ही दृष्टि का दोष है। क्या इस्से भी और कुछ प्रमाण लोगी, सुना चाहो तो कहैं, नहीं तो बस हो गया।
‘’तुम्हारा मेरा समागम हुआ करता तो समय कट जाता, और तुम्हैं सिखाने में मेरा भी जी लगता, पर इस दुःखदाई रीति से सभी हारा है परवश सभी सहना पड़ता है।
‘’यदि तुम मुझै इतना चाहती हो कि जैसा तुमने अपने करकमलों से लिखा है तो बस रहने दो, मैं इस विषय में कुछ नहीं कहता। यह आपकी सहज दया है, मन में आवै तो दो डड़ीचँ लिख भेजना, हाथ जोड़ता हूँ।’’
द्वापर कृष्णयुग तुम्हारा शुभचिंतक फाल्गुण श्यामसुंदर’’
यह पत्र मेरे कलेजे में बान सा लगा। मैंने इसको कई बार बाँचा और मन ही में समझ गई। क्षणभर तनकी सुधि भूल गई। मन में बहुत सी बातैं सोचने लगी। श्यामसुंदर उत्तर की आशा लगाए रहे। जब मैं नहाने जाती मेरे पीछे आप भी नहाने जाते। कहते कुछ नहीं पर ध्यान मेरे पर लगा रहता। इधर उधर देखते पर छिन छिन पै टेढ़ी दृष्टि करके मुझै भी देख लेते। जब मैं घर लौट जाती वे भी दूसरी खोर से अपने कुटीर को चले जाते पर ऐसा जान पड़ता कि मेरे ध्यान से क्षण-भर विलग नहीं रहते। मैंने कुछ उत्तर न दिया क्यौंकि मुझै ज्ञान न था कि क्या लिखूँ। अंत को वे बीमार हुए। ज्वर आने लगा। एक तो बड़े आदमी के लड़के दूसरे सर्वदा सुख ही में रहे इस्से बड़े सुकुमार थे मुरझा गए। ज्वर दइमारे ने उन्हें थोड़े ही दिनों में निर्बल कर दिया, पर ओषधी अच्छी कीं। एक या डेढ़ सप्ताह में चंगे हो गए। चलने फिरने लगे, खाने पीने लगे। अब कुछ कुछ बल भी आने लगा पर भली भाँति अच्छे नहीं हुए। इस ग्राम के जलवायु ने उन्हें बहुत अशक्त कर दिया था। वैद्य ने उन्हैं मति दी कि एक मास तक दूर देश की यात्रा करो नहीं तो और शरीर बिगड़ैगा। वैद्य को उन्होंने हामी भर दी पर मुख पर पीरी आ गई उन्हैं मेरा वियोग सहना दुस्तर था। छन भर मेरे बिना रह नहीं सकते थे, पर शरीर की भी रक्षा मुख्य थी। थोड़ी देर में वैद्य के जाने पर उन्होंने सत्यवती को बुला के कहा कि ‘’श्यामा से मैं कुछ कहूँगा तू जा उसे बुला ला’’ यह सुन सत्यवती ने आकर मुझसे कहा। मैंने सोचा आज क्यौं बुलाते हैं। कुशल तो है तौ भी जाने के लिए तत्पर हुई। सफेद कोसे की सारी पहन, और एक छोटी सी माला गले में डाल कर चली। अपनी देहरी पर जाकर ठठक गई, फिर मन में सोच आया कि कहाँ मुझै बुलाया है और मैं कहाँ जाती हूँ, यह बात तो मैंने सत्यवती से भी नहीं पूछी थी, कहाँ बे ठीक ठिकाने की उठ चली। हाय रे भगवान् बड़े कठिन की बात है – मैंने बड़ी भूल की थी। मैं बाहर निकल कर कहाँ जा ठाढ़ी होती। ऐसा सोच विचार के फिर लौट आई। सत्यवती से कहा, ‘’मुझै कहाँ बुलाते हैं – जा पूछ आ’’ सत्यवती गई और एक क्षण में आकर कहा कि ‘’उन्होंने तुझै कविता कुटीर में बुलाया है। अभी दुपहरी का समय है – कोई नहीं है चली जा’’ – मैं बाहर निकली और श्यामसुंदर के कुटीर के तीर ज्योंहीं पहुँची श्यामसुंदर उठकर बाहर आए और मेरा हाथ बड़े चाव से पकड़कर भीतर ले गए। ले जाकर मुझै बड़ी कोमल कुरसी में बैठाया और वे भी मेरे सन्मुख एक हाथ के दूरी पर बैठ गए। यह कुटीर बड़ा मनोहर था। इस कुटीर में चारों ओर के द्वारों पर माधवी लता छाई थी, चमेली की बेली अपने लंबे हाथ पसारे माधवी से मिल कर मुसकिराती थी। गुलाब भी अपनी अलौकिक आब फूलों के मिस दिखाता था। विलायती किते की कुरसियाँ मखमल और रेशम से मढ़ी करीने से धरी थी। गोल चौपहल और अनेक आकार के मेज जिन पर रंग बिरंग की बनातैं पड़ी थीं बीच में रखे थे। मनोहर और विचित्र विचित्र पूठों की पुस्तकें अच्छी रीति पर धरीं थीं। सामने और आजू बाजू अलेमारियाँ जिनमें सैकड़ौं पुस्तकैं अनेक विद्याओं को सिखानेवाली भरी थीं – शोभित थी। बीच में एक गोल छोटा सा मेज धरा था, उस पर श्यामसुंदर का चित्र हाथी-दाँत की चौखट में जड़ा धरा था इसको देख सभी दंग हो जाते। उसमें श्यामसुंदर हीरे का बड़ा सिरपेच बाँधे जिसमें बड़े बड़े बहुमूल्य के पन्ने लटकते थे हीरे ही की सुंदर कलगी दिए – हाथ में कश्वाल लिए बैठे थे। कंठ में बड़े मोतियों का कंठा – और मयूरहार उर में झूलता था। पछाहीं पगड़ी अड़ी थी। कानों में मोती के बाले कपोलों पर झलकते थे। चंद्रहार भी मन को चुराए लेता था। मैंने तो आज तक ऐसे बहुमूल्य रत्न कहीं नहीं देखे थे। कपटनाग की यद्यपि पुरानी गादी थी पर ए लोग सदा चाल से रहे और आश्चर्य नहीं कि इनकी चालीसी की चालीसी श्यामसुंदर के मुकुट के एक मणि के भी मोल को न पाती। इनके इस चित्र में मुख से वीरता और माधुर्य्यता दोनों पाई जाती जो इनके कुल और काव्य-कुशलता के हेतु थी। नेत्रों से प्रेम टपकता था। ललाट से अशेष विद्वत्ता जान पड़ती थी। उस समय ए दो और बीच बरस से अधिक न रहे होंगे। डाढ़ी पर एक एक अंगुल बाल थे। यह छबि मेरे जी में गड़ गई – और शोच किया कि उस समय मुझसे इनसे क्यौं परिचय न हुआ।
इसी गोल मेज के किनारे एक और चौपहल मेज धरा था। इस पर सुंदर काले काठ की मंजूषा में एक सुरीला बाजा रक्खा हुआ था। इस अरगन बाजा को श्यामसुंदर जब मौज होती बजाते और सुनाते। गाने बजाने का भी इनको व्यसन था। उसी कुटीर के पश्चिम भाग में एक परदा पड़ा था और उसके उस तरफ उनका पलँग बिछा था। एक नजर में जो कुछ देखा तुमको सुनाया – जब हमारे भेट का हाल सुनो। श्यामसुंदर मुझै बैठाकर सब काम छोड़ वार्त्तालाप करने लगे। उन्होंने पूछा, ‘’कुशल तो है – ‘’ मैंने उत्तर दिया, ‘’आपके रहते हमैं अकुशल कैसी? आप तो भले हैं?’’
(साँस लेकर) ‘’हाँ बहुत अच्छे और अब तुम्हैं देख और भी अच्छे हो गए – तुम तो देखतीं थीं मैं कैसा बीमार हो गया था। वैद्य ने ओषधी की, अब अच्छा हो गया। पहले से कुछ अच्छा हूँ – पर एक वज्र पड़ा,’’ इतना कहकर एक लंबी साँस ली।
मैंने कहा, ‘’क्या? कुशल तो है – ईश्वर ऐसा न करै – ‘’ मैं तो कुछ जान गई थी कि वही यात्रा की बात होगी, पर मुझै भी उनके बिना कैसे चैन पड़ता यही सोचती रही।
श्यामसुंदर ने उत्तर दिया, ‘’वज्र यही कि अब कुछ दिनों के लिए हमको तुमसे विलग होना पड़ैगा। वैद्य ने मेरे शरीर की अवस्था देखकर कहा है कि जलवायु दूसरे देश का सेवन करना होगा नहीं तो शरीर और भी बिगड़ जायगा, शरीर की रक्षा मुख्य है – तो अब मैं दो एक दिन में जाऊँगा, तुम्हारा तो मेरे साथ जाना नहीं हो सक्ता और इधर तुम्हारा वियोग। अब नहीं मालूम क्या होगा’’ – इतना कह आँखों आँसू भर मेरे दोनों हाथों को अपनी छाती से लगा लिया और चुप हो गये। सिसकी भर रोने लगे और फिर कुछ भी न कहा।
मैंने उनके नेत्र आँचर से पोंछ दिए और उनके सिर को छाती से लगा कर उन्हें समझाया। पर उनके नैन सावन भादों हो गए थे। सावन भादों की सरिता कहीं रुकती हैं। उनके नैनों से ऐसा धारा-प्रवाह उमड़ा कि मेरा आँचर भींज गया गया। मैंने उसास ली और रोने लगी। प्रीति की नदी उमड़ आई मैंने मन में कहा कि अंत को यही होता है – पर अब तो लग ही गई थी छूटती कैसे। मैंने श्यामसुंदर से कहा, ‘’कुछ कहोगे भी कि बस रोते ही रहोगे, मुझै भी तुमने अपने दुःख दिखाकर दुःखी बना दिया। तो अब तुम्हैं कौन समझावै’’ – ‘’मुझसे क्या पूछती हौ। मैं तुम्हैं छोड़ कैसे जा सकूँगा – जिसको नैन प्रतिदिन देखते थे उसको अब बहुत दिनों तक न देखैंगे। अधिक कहता हूँ तो अभी द्वारे पर भीर लग जायगी, और समय भी अधिक इसमें नहीं लगाना चाहिए। तो सुनो, मेरा जाना तो अब ठीक हो चुका। इस शरीर के लिये जाना ही पड़ा। मेरी तुमसे यही विनती है कि तुम इस दीन और मलीन अपावन जन को मत भूलना। मैं तुम्हैं अपना पता लिखकर कई लिफाफे दिए जाता हूँ तुम इसके भीतर पाती लिखकर बंद कर देना और मेरे विश्वास-पात्र हरभजना को दे देना वह मेरे पास पहुँचा दिया करै या तो डाक द्वारा भेजा करैंगा और मेरे भी उत्तर तुम्हैं उसी के द्वारा मिला करैंगे – पर यह मेरी बारंबार विन्ती है कि भूलना कभी नहीं और एक बेर प्रतिदिन मुझ दीन का स्मरण करना। यदि मेरी कोई सहायता का कभी काम पड़ै तो मुझै खबर पहुँचाने में विलंब न करना – यदि मेरे बिना कोई काम ऐसा आन पड़ै कि न हो तो मैं सब छोड़ कै आ जाऊँगा। दया रखना – देखो – पर बस, अब लोग आवैंगे तो तुम जाव – हाय रे वज्र हृदय! फट नहीं जाता और उलटा ‘जाव’ ऐसे वचन कहवाता है’’ – इतना कह फिर भी आँखैं भर लीं।
मैं तो निःसह होकर श्यामसुंदर के अंक में गिर पड़ी। श्यामसुंदर ने मुझै सम्हार लिया। यदि वे सहारा न बन जाते तो मैं कबकी भूमि पर गिर पड़ती। श्यामसुंदर ने अपने वस्त्र से लोचनों को पोंछ उरई के व्यजन से व्यजन करने लगे। गुलाब जल की पिचकारी मेरे नैनों में मारी और मुझै चुंबनों से आच्छादित कर दिया। मुझै कुछ संज्ञा हुई। मैंने अपनी सकपकानी दृष्टि उनके मुखारविंद पर फेकी। बरौनी में मेरे आँसू लटके थे। उन्होंने फिर भी इस बार पलकों का चूमा लेकर उन्हैं पोंछ दिया और बोले, ‘’तुम क्यौं रोती हौ आज सब प्रेम खुल गया, न तो तुम हमसे दुरा सकी और न मैं ढाँक सका। कैसे ढाँकता, प्रेम क्या सूजी है जो छिपै, पर यदि हमी तुम जानैं तो अच्छा है। प्रीति प्रकट नीकी नहीं होती।’’ इतना कह उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और फिर बोले – ‘’आज यदि तुम्हारी आज्ञा पाऊँ, तो ‘प्यारी’ – कह के तुम्हैं टेरूँ।’’ मैं चुपकी रही। ‘’तुम कुछ देर तक मौन रहीं, मुझै ढाढ़स हुआ, मैं तुम्हैं अवश्य प्यारी कहूँगा, क्षमा करना तो – प्यारी! प्रानप्यारी! मैं तुम्हैं जी से चाहता हूँ मोह करता हूँ – सुंदरी मेरे हृदय में तेरी गाढ़ी प्रीति भरी है। जगन्मोहिनी! मैं तेरे मूरति की पूजा करता हूँ, तू मेरी इष्ट देवी है और मैं तेरा भक्त हूँ। मैंने तुम्हारी मूर्ति की पूजा उसी दिन से आरंभ की थी जिस दिन पहले तुम्हैं उस दिन अटारी पर बार बगराते देखा था।’’ इस वाक्य को भली भाँति बल दे के कहा, वह कहन मेरे हृदय में गड़ गई – उतनी गहिरी कि अद्यापि मेरे हृदय के उत्तर दायक तार झनझनाते हैं। मैंने भी उन्हें कहा, ‘’प्यारे जो हाल तुम्हारा था सोई मेरा भी था पर गुप्त ही रखना पड़ा, आज अच्छा हुआ जो दोनों के जी की सफाई हो गई।’’ इतना सुनाय मैंने उनके करकमल पकर अपने हृदय से लगाए – उनने मेरे हाथ को ले अपने ओठों से लगाया। मैंने झींका भी नहीं, मेरा हृदय तनिक भी उस अपूर्व आनन्द को स्मरण कर न मुड़ा और मुझै उस समय ऐसा सुख हुआ जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। ज्यौंही मैं उस समय की तरंगों के बल से आगे झुकी उनका अनुपम मुख निरखने लगी – और उनके काले नैनों की गंभीरता में उनके उस प्रेम को बाँचने लगी जो अभी उनके अधर पल्लव से निसरा था – त्यौंही उन्होंने मुझै गलबाही देकर हृदय से लगा लिया – हम लोगों के अधर मिले और बड़े विलंब में चुंबन का अनुकरण शब्द निकला। उन्होंने बिदा दी और मुझे इस प्रतिज्ञा पर छोड़ा कि ‘’चलते समय एक बेर और दिखाई देना।’’
आह! उस क्षण का सुख कैसे कहूँ ये वे भाव थे जो मेरे गंभीर हृदय के कुंड से अमृत की नाईं झरने लगे थे। यह मेरा शुद्ध और पावन प्रेम था जो श्यामसुंदर के लिए अंकुरित हुआ था। मैं उसे टटोल भी चुकी थी। जान भी गई कि यह ऐसा ही था। ‘प्रेम’ – प्रेम जिससे इंद्रियों से कुछ संबंध नहीं – प्रेम – जिस पर इंद्रियों का धक्का नहीं लगा था, प्रेम – जो आत्मा के दृष्टिगोचर हो चुका था।
‘’मैं घर गई, बैठी उठी, पर श्यामसुंदर की झलक आँख की ओट न हुई। फिर भी इच्छा हुई कि जाकर भेंट करैं पर सोचा कि बार बार का जाना अच्छा नहीं होता। कदाचित् कोई कुछ कहने लगे तो भी ठीक नहीं। इसको सोचा तो सही पर न रहा गया। अंत में कागद कलम लेकर एक छोटा सा पत्र जहाँ तक लिख सकी लिख भेजा। वह यह था –
‘’मनमोहन प्यारे,
आपने जो जो कहा था सो सब याद है। आपके बदन और मुख हमारे दोनों आँख के सामने झूलते रहते हैं। पर आपके कुटीर के द्वार की जाली नैनों को तुम्हारे तक पहुँचने को रोक देती है – क्या मोह कमती हो गया? बस अब नहीं लिखा जाता – जो मन में है मन ही में रहने दो। ‘’ऐ बाग के माली अपने बाग के फलों की भली भाँति रक्षा करना – तकना – कोई पक्षी चोंच न लगाने पावैं’’ – चलते समय अटारी पर से भेंट होगी, बस’’।
द्वापर फाल्गुण।
इस पत्र को भेज दिया। उत्तर नहीं मिला और उत्तर की अपेक्षा भी तो नहीं थी। दूसरे दिन श्यामसुंदर के जाने की तैयारी हुई। डेरा डंडा सब पहले ही चला गया था। अकेले वे ही रह गए थे। भोर होते ही उठे स्नान-ध्यान कर कुछ कलेवा किया और सात बजे तक जाने के लिए उपस्थित हो गए। रथ बड़ी देर से कसा खड़ा था। उनके नर्मसखा मकरंद भी संग हो गए। इनकी सकुच मुझै बहुत लगती थी और सच पूछो तो अनेक कारणों से लाज और भय भी रहा आता था। ये सब बातैं श्यामसुंदर को पहिले से ज्ञात थीं – इसीलिए उन्होंने मकरंद को पहले ही रथ के निकट भेज दिया था – और वे चलते समय अकेले रह गए। मैं भी अपनी प्रतिज्ञा पालने के लिए अटारी पर चढ़ गई, सत्यवती और सुशीला भी मेरे संग में थीं। मैंने श्यामसुंदर को निकलते देखा, मेरी उनकी चार आँखैं भईं, उन्होंने मेरा प्रान अपने साथ ले लिया – बार बार मुरक मुरक मेरी ओर दृष्टि फेकते थे। मैं भी मुर मुर देखती थी – अपने नेत्रों में जल भर लिया। मेरी भी वही दशा हो गई। सूख साख काठ हो गई, मुख से वचन न निकला। ज्यौंही मेरे घर के नीचे आए मुझसे रहा न गया – मैंने झट दोहा पढ़ा –
‘’चलत चलत तौ लै चले सब सुख संग लगाय। ग्रीषम वासर शिशिर निशि पिय मो पास बसाय॥’’
इस दोहे को उन्होंने नीचा सर करके सुन लिया और एक दोहा उसी समय बना कर पढ़ा –
जौं शरीर आगू चलत चपल प्रान तुहि जात। मनौ वातवस फरहरा पाछे ही फहरात॥
जो कुछ उन्होंने कहा सब सत्य था। मैंने अपने जी में बहुत धीरज धरा पर एक भी काम न आया। मेरी दृष्टि उनके पीछे चली, वे गए – नदी के तट पर पहुँचे, रथ पर चढ़ चले। मेरा भी जी मन के रथ पर बैठ कर उनके पीछे हो लिया। वे जाते हैं, मझधार में पहुँचे। इधर मेरा भी जी प्रीति की नदी के मझधार पहुँचा। केवट तो चला जाता था, मुझै कौन बचाता, पर आशा वृक्ष की शाखा पकड़ कर लटक गई। श्यामसुंदर गए, उस पार हुए पर मैं इसी पार थी। एक मन हुआ कि घर की कुल कान छोड़ दौड़ जाऊँ – पर लाज के लगाम ने मुँहजोरी रोक दी। नदी के तीर तक मैं भी गई। श्यामसुंदर उस पार पहुँचकर ऊँचे टीले पार बैठ पारदर्शक यंत्र को अपने नैनों से लगा – मुझे देखने लगे। क्या जानै मैं उन्हैं दिखी या नहीं पर मैं उन्हें जहाँ तक दृष्टि गई बराबर देखती रही। वन की लता पता मेरे ऐसे बैरी भए कि उन्हैं शीघ्र ही लोप कर दिया। रथ चला, पहिए के धूर दिखाने लगी। इधर भी मेरी धूर ही धूर दिखाती थी। कहावत है कि ‘’दिलों पर खाक उड़ती है मगर मुँह पर सफाई है, ‘’अंत को मैंने अपने जी से यह दोहा पढ़ा –
वह गए बालम वह गए नदी किनार किनार। आप गए लगि पार पै हमैं छोड़ि मझधार॥
स्नान करके घर आई। घर के कुछ काम न अच्छे लगे। माँ से कहा, ‘’माँ आज मेरा माथा पिराता है।’’ माँ ने पूछा, ‘’क्यौं’’ – मैंने उत्तर दिया, ‘’क्या जानूँ – शरीर तो है।’’ माँ बोली, ‘’तौ जा सो रह’’ – यह तो मेरे ही मन की कही। मैं शीघ्र जा सेज पर सो रही और मूड़ को ढाँक खूब रोई – भूख प्यास सब भूल गई। तन से मन निकल कर मनमोहन के पास चला गया। खाट पर केवल शरीर धरा रहा। माँ ने बहुत कहा, ‘’बेटा कुछ खा ले!’’ पर मैंने कुछ उत्तर न दिया। अंत को माँ ने मुझै सोई जान फिर हूँत न कराया – वृंदा ताड़ गई पर मुझसे कुछ भी न कहा। यद्यपि वह मुझै बहुत चाहती थी पर उसका श्यामसुंदर पर गुप्त प्रेम रहने के कारन मुझसे कुछ कुछ बुरा मानती थी। श्यामसुंदर उस्से भी हँस के बोलते पर उनका सब प्रेम मेरे ही लिए था। वे अपने प्रान को भी इतना नहीं चाहते थे। नैनों की तारा मैं ही थी। प्रेम-पिंजर की उनकी मैं ही सारिका थी। ब्रह्म, ईश्वर, राम, जो कुछ थी मैं थी, वे मुझै अनन्य भाव से मानते थे, पर हाय री मेरी बुद्धि अब कहाँ विलाय गई। भद्र! मैं अब वह नहीं हूँ जो पहले थी अब वह बात ही चली गई। मैं श्यामसुंदर के मुख दिखाने के योग्य नहीं हूँ। श्यामसुंदर अभी तक मुझै उसी भाव से मानता जानता है और अनन्य भाव से भजता है पर मैं – हाय – अब क्या कहूँ, मेरी कपट रीति विश्वासघात – हाय रे दई – मैं सब कुछ एक कुवचन सहूँगी। जगत की कनौड़ी बनूँगी – हाय रे दई – मुझै जो चाहै दंड दे – मेरी गर्दन झुकी है ले जो चाहै सो कर – मैं हूँ तक न निकालूँगी। मार मार जार डार जैसा मैंने उन्हैं जराया है तू भी मुझै जलाकर क्वैला कर दे – हाय रे ईश्वर – हाय हाय रे करम – क्या मैंने सब धरम बहा दिया। किस भरम में पड़ी शरम भी नहीं आती – हा हा’’ ऐसा बिलाप करते करते गिर पड़ी। सत्यवती और वृंदा ने सम्हार लिया। अपनी ओली में बैठाकर मुख पोंछा हवा करने लगीं। चूमा लिया।
पर मैं तो इस लीला को देख दंग हो गया। स्तब्ध होकर भीति की सी चिचौर बन गया, अनिर्वाच्य हो गया। आश्चर्य करने लगा कि ऐसे मनोहर शरीरवाले भी जो केवल पुण्य के पुंज हैं, दैहिक, दैविक और भौतिक तापों की ताप में तपते हैं आश्चर्य है कोटिवार आश्चर्य का आस्पद है, मैंने कुछ सुरीली तानें भरीं, श्यामादेवी की आँखैं खुलीं। वृंदा विजना झलती थी। वह इन सब बातों की प्रत्यक्ष देखने वाली थी सब कुछ समुझ बूझकर सासैं भर भर के रह गई। देवी को संज्ञा हुई, मैं हाथ जोड़कर बोला।
‘’कमलनयनी! तू क्यौं इतनी अधीर हो गई। अभी तो कहानी पूरी भी नहीं हुई इतने ही में ऐसा हाल हुआ, पूरी होते न जाने तेरे प्रान बचैंगे कि नहीं – वृंदा तनिक देवी को समझा दे शोच न करै, क्या ऐसे जनों को भी दुःख का लेश चाहिए।’’
श्यामा देवी गद्गद स्वर और स्खलित अक्षर से बोली, ‘’सौम्य! तुम बड़े सभ्य हो। यह स्थल ही ऐसा है कि यदि तुम इस सब वृत्तांत के साक्षी होते तो न जाने तुम्हारी कौन सी गति होती, पर तुम्हारा चित्त इस कहानी को पूरी कराने में लगा है तो लेव सुनो। मैं रोते गाते सब कुछ कह सुनाऊँगी,’’ इतना कह सुख से सिंहासन पर बैठ गई। चंद्रमा की प्रभा ने मुख कोकनद का विकास कर दिया था। दंत की छटा मंद मंद कौमुदी में मिली जाती थी। वृंदा पंखा झलने लगी, सत्यवती ने पान का डब्बा खोलकर सामने धर दिया और सुशीला रात बहुत हो जाने के कारण सोने लगी। देवी ने मुख पोंछा दोनों हाथ पसार ईश्वर से मंगल कुशल के साथ पूरी कथा कहने के शक्ति का आवाहन किया, सरस्वती से हाथ जोड़े भगवती के पदकमल स्पर्श करके यों कहने लगी –
‘’सुनो जी मेरी बड़ी बुरी दुर्दशा हुई। मुझै श्यामसुंदर का वियोग सताने लगा। उनके उठने बैठने के ठौर मुझे काटे खाते थे और मैंने बार बार यह छंद पढ़ा –
खोर लौं खेलन जाती न तौ कहुँ आलिन के मति में परती क्यौं। देव गुपालहिं देखती जौ न तो वा विरहानल मैं बरती क्यौं॥ बावरी आम की मंजुल वाल सुभाल सी है उर मैं अरती क्यौं। कोमल क्वैलिया कूकि कै झूर करेजन की किरचैं करती क्यौं॥
बस मेरी ठीक यही दशा हो गई थी, परवश में पड़ी थी। प्रान तो श्यामसुंदर के पास थे शरीर मात्र यहीं रह गया था। उधर श्यामसुंदर भी बेचैन थे। मकरंद से अपना दुःख का रोना रोया करते। संसार उन्हैं सूना हो गया। अन्न जल में स्वाद नहीं लगता। साँप की साँस सी समीर लगती, शरीर में ऐसी पीर उठती मानौ भुजंग की मैर हो, नेत्र नरगिस के भाँति हो गए, पीरीं पीरीं पत्तियों की भाँति तन सूख गया था। बदन सूखि के किंगड़ी और रगैं तार हो गई थीं, रोम रोम से सुर उठकर मेरा ही नाम बजता था। यद्यपि अभी उन्हैं गए दो चार दिन से अधिक नहीं भए थे तथापि विरह ने व्याकुल कर दिया था। दिन भर मेरा गुन गाते और रात को मेरा स्वप्न देखते। वन वन धूर छानते फिरे वन पर्वत की कंदराओं में मेरे ही वियोग की तान गान कर कर झाँईं से हुँकारी झराते थे।
देखी कहूँ मृगनैनी अहो वन पर्वत निर्झर सो मुहि भाखो वात सों कंपित पादप हाय कहो किहि आतप को दुःख चाखो। हौं जगमोहन श्यामा विहाय फिरौं विलगाय इतै मन माखो दै जु बताय कहाँ गई मोहिनी मुरत आरत को जिय राखो॥ देखी कहूँ सरिता गिरि खोह कहूँ मनरंजनि मोहिनी मूरति सो गई पंकज लेन कै खेलत कै बहलावत है मनहूँ अति। कै कहुँ प्रेम प्रकासिबे काज लुकाय रही वन पल्लव सूरति हौं जगमोहन देहु बताय वियोग शरीर अजौ मुहिं झूरति॥
इसी प्रकार के अनेक गीत अभीत हो वन में गाते फिरते। इस चौपाई को बार बार कहते, मकरंद ही केवल इन्हैं साहस देता रहता।
सो तन राखि करब मैं काहा। जिन न प्रेम पन मोर निबाहा॥ हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम बिनु जियत बहुत दिन बीते॥ और कभी कभी यह भी – मुसौवत खीचले तस्वीर गर तुझमें रसाई हो। उधर शमशीर खींची हो इधर गरदन झुकाई हो॥
ये रस की भीनीं तुकैं गा गा कर आँसू भर लेता। अंत को उसने मुझे एक पत्र भेजा – जिसको मैं तुमसे कहती हूँ।
‘’प्रानप्यारी, ‘’रटत रटत रसना लटी तृषा सूखिगे अंग। तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग॥’’
इसे समझ लेना जब से मैं तुम्हारी दया दृष्टि से दूर हुआ दर दर घूमा पर ऐसा कोई न मिला जो तुम्हारे विरहताप की ताप मिटाता। वन के रम्य रम्य मनोहर स्थलों को देख तुम्हारे बिना करेजा टूक टूक हो जाता है। प्रतिकुंज में तुम्हैं देखता हूँ – पर स्वप्न सा जान पड़ता है। इस साल श्यामापुर में मेरी फाग नहीं हुई, कारण तुम जानती हो, लिखने का प्रयोजन नहीं, बस – समझ जावो। इसी से मैंने टर दिया सो देखो इस साल की फाग ने मेरे बदन में आग लगा दी है, तन में वियोगाग्नि की भस्म रूपी अबीर लगी है, नैन पिचकारी हो गए हैं और ताप की ज्वाला में तन जरा जाता है। शोक और चिंता रूपी जुगल कपोलों में पीर की राख लगी है। अधिक क्या लिखैं, तुम्हारा वियोग सहा नहीं जाता। इस पावन वन में केवल मैं ही अपावन होकर विचरता हूँ। मुझै वन के जंतुओं ने भी दीन मलीन और पापी जान तज दिया। जब तुमसे विलग हुए तब हुए तब और कौन जगत में मेरे संग लग सक्ता है। मुझै पक्षी भी देख भागते हैं। शुक सारिका भी क्रूर शब्द सुनाते हैं – अब कहाँ तक कहैं। इसका उत्तर देना, मैं भी कुछ दिनों में आ पहुँचता हूँ धीरज धरना और मुझै कदापि अपने जी से न टारना।
दोहा
चातक तुलसी के मते स्वातिहु पियै न पानि। प्रेम तृषा बाढ़त भली घटे घटैगी कानि॥
इस पावनारण्य से मैं मार्जारगुहा को जाऊँगा, वहाँ से वीरपुर होते वाणमर्य्यादा नामक ग्राम में दो दिन निवास करूँगा, वहाँ पहुँचकर मार्ग का वृत्त लिखूँगा पर तुम इस पत्र के उत्तर देने में विलंब न करना। पूर्वोत्तर युक्ति से पत्र मुझै अवश्य मिलैंगे। इन वनों का भी संपूर्ण वर्णन – पर संक्षेप यदि हो सका तो तुम्हारे मनोरंजन के लिए भेजूँगा – कृपा रखना।
द्वापर-फाल्गुण तुम्हारा वही अपावन पावनारण्य श्यामसुंदर – ‘’
यह पत्र मुझै वृंदा के द्वारा मिला – उसे हरभजना ने दिया था। मैंने पढ़कर छाती से लगाया और बार बार चूमा। मैंने उसी क्षण इसका उत्तर लिखा।
उत्तर
‘’श्यामसुंदर!
वृंदा ने हमैं आपकी पाती दी। आप हमारे विरह में क्यौं – अब क्या लिखूँ? भूल गई! क्षमा करो। चलते समय मैंने कुछ कहा था न? उत्तर क्यौं नहीं दिया, दूर निकल गए, क्या चिंता –
‘’हिरदे सै जब छूटि हौ मरद बदौंगी तोहि’’
दोहा
पंच द्यौस दस औधिकर गए नाथ केहिं देश। सो बीती अब प्रान कहु रहैं सु किमि तन लेश॥ वीर धीर मुहिं तजि गयो लै गौ असन रु पान। हा प्यारो क्यौं छोड़िगो दइमारे सठ प्रान॥|
तुम तो चतुर हो इसे सत्य जान जो उचित हो सो करना –
द्वापर-फाल्गुण। श्यामा’’
यह पत्र उसी रीति पर भेज दिया और उनके पास भी पहुँच गया। उसके उत्तर में उन्होंने एक लंबा पत्र पीतवन से लिखा, उसमें प्रति दिन का वृत्तांत था।
‘’प्राणप्यारी, तुम्हारा पत्र मुझै पीतवन में मिला मुझै इतना सुख हुआ कि मैं अपने को भूल गया। जिस समय दूत ने तुम्हारी पाती मुझै दी मैं शिवरूप साक्षात् हो गया। इधर उधर ढूँढ़ने लगा कि इस दूत को क्या दूँ। पाती से आधी भेंट होती है। उसके प्रत्यक्षर मेरे लिए रामनाम थे। बड़ी देर तक उलट पलट बाँचा और सोने के संपुट में मढ़कर हृदय-कपाट के द्वार पर लटका। पत्रवाहक को सकुच कर चार सहस्र स्वर्ण पारितोषक दिये। उस गरीब का काम ही हो गया। हमारी तुम्हारी जय मनाते घर गया। पावनारण्य से बुधवार के दिन सायंकाल मकरंद और मधुकर के साथ चलकर मार्जारगुहा में पहुँचे, आज केवल एक कोस चलना पड़ा। इस अनूप देश का अधिपति एक वृद्ध भील जिसका नाम विराध है मार्जारगुहा में बास करता है, इसके दो चार तुरंग और हाथी सदा संग में रहते। इसके विकट आयुध भाला और फरसा थे। तलवार कटि में लटकी रहती – हाथी का सा भारी मस्तक – कराल दंष्ट्रा – सिर पर फूल की कलगी खुसी – वृक्ष से भुजा विकट गह्वर सा उदर – अजगर से दोनों पाँव चट्टान सी छाती – हाथी पर सवार तरवार आगे धरे ऐसा भयानक लगता था मानौ भयानक रस आज मूर्तिमान् होकर सजीव पर्वत पर बैठा चला आता है। यहाँ बहुधा वन दूर-दूर पर हैं। यह महीप मेरी अगुआनी के लिए महासागर तक आया। आज मनुष्य और पशु की वार्त्तालाप जो पुराने ग्रंथों में लिखी हैं ठीक ठीक सत्य और प्रत्यक्ष देखने में आईं।
‘’नर बानरहि संग कहु कैसे’’
इस चौपाई का मानो अर्थ खुल गया। इस ग्राम में एक दिन चूतवाटिका में डेरा लगा कर रहा। अतिथि-पूजन भली भाँति हुई है और चलते समय मधुकर के हाथ गरम कर दिए। यह एक ब्राह्मण हैं, यहाँ यही लेखा लगा।
‘’वृहस्पति के दिन हम लोग वीरपुर पहुँचे। यहाँ का ग्रामपति विराध से कुछ सभ्य है इसका नाम खर है – यहाँ मलयज नामक वन निकट है यह खर उस वन का केसरी सा दिखता था। इसका रूप विराध से कुछ थोड़ा ही अच्छा है इसलिए अधिक नहीं लिखते। यह ग्राम मैदान में है। जलप्राय वन के निकट ही यह बसा है। यहाँ के जलवायु दोनों भले नहीं इसी से दूसरे ही दिन कूच कर गए। शुक्र के दिन तुम्हारे ही पत्र की आशा लगी रही।’’
‘’शनिवार का दिन वाणमर्यादा में बीता, यहाँ से पर्वत पाँच कोस पर रहे। यहाँ अच्छा सरोवर जिसके किनारे कदली का उपवन है शोभित है, भगवान् भवानीपति का मंदिर यहाँ के ग्रामीणों को अवलंब है। यहाँ के ‘रसालाराम’ में तंबू तना था। ग्राम भी कुछ छोटा नहीं और ग्रामाधिप भी ऊँचे जात का पुरुष है। आज होली जरी – मेरी शरीर तुम्हारे बिन आप होली हो गया है। झोली में अबीर भर भर हमजोली की भीर में घुस रसाल रसाल कबीर गाते हैं। इन वन में होली का उत्सव कुछ विचित्र सा जनाता है, जैसे दूध में मिरचा, विलायत के गिरिजाघर में कुरान की आयत का पढ़ना या रामचंद्र के मंदिर में प्रभु ईशु-मसीह का नाम लेना और बेंड बजाना तथा मसजिद में शंखध्वनि का होना इत्यादि जैसे असंभव और असंगत बनाते हैं वैसे ही इस देश में ऐसे उत्सव थे।’’
‘’रविवार के दिन मैंने चातकनिकुंज जाने का विचार किया। यह उत्कल देश का द्वार है और यहाँ का स्वामी बड़ा नामी पुरुष है, पर यह देश तुम्हारे पूर्व पुरुषों का निवास था इसी से वर्णन नहीं किया। तुमने अपने माता पिता से इसका सब वृत्तांत सुन ही लिया होगा – निदान यहाँ से प्रातःकाल ही को रथ पर बैठा और सायंकाल तक देख भाल फिर बाणमर्यादा को लौट आया। इस ग्राम से यह केवल चार कोस पर था। इस राज्य में रसाल के रसाल रसाल विशाल वृक्ष बहुत हैं, इसका नाम मैंने कोकिलकुंज रख दिया है। इस ग्राम का स्वामी जब मैं गया उपस्थित न रहा पर उसके प्रतिनिधि ने बड़ा सत्कार किया और यहाँ के मुख्य मुख्य निवास और कार्यालय दिखलाए। वश का सघन वन इसके चारों ओर लगा है और राजा के महल एक पर्वत पर बने हुए हैं जो सजल होने के हेतु अति मनोहर लगते हैं। निर्झरों का घर्घर शब्द -वनजंतुओं का गर्जना – सिंह व्याघ्रों का तरजना जिसे सुन विचारी कोमल बालाओं के हृदय का लरजना – इस दुर्ग के गुर्जों ही से बैठे सुन लो। सुंदर सरोवर बरोबर जिन पर तरोवर झुके हैं शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ से लौट कर बाणमर्यादा के ‘रसालाराम’ में रात भर विश्राम किया। तुम्हारा स्वप्न आधी रात को देखा। ऐसा देखा मानो तुम्हारे पिता ने तुम्हें कहीं भेज दिया हो और ज्यौंही मैं उन्हैं निवारने लगा मेरे नेत्र खुल गए करेजा काँप उठा। होनहार प्रबल होती है। पर भावी वियोग यद्यपि स्वप्न ही था तथापि शोक का अंकुश कुश का भाँति हृदय में गड़ गया था कुछ गड़गड़ तो नहीं हुआ, लिखना। पर तुम्हारी प्रीति की कथा यहाँ तक विदित है।’’
‘’सोमवार 2 – आज मैं बाणमर्यादा से वाराहगर्त्त को आया। छोटे-छोटे ग्राम बहुत से विराम के लिए पथ में मिले पर कहीं नहीं ठहरा। वाराहगर्त्त नामक वन अच्छा सुहावना लगता है। यहाँ के पर्वत और शैल आकाश को अपने अपने श्रृंगों से छूते जान पड़ते हैं। यह तराई का प्रदेश आगे बढ़ने से ऐसा लगाता है मानों अघासुर के उदर में हम लोग ग्वाल बाल के नाईं घुसे जाते हों, दोनों ओर सघन शैल की श्रेणी – बीच में सूक्ष्म मार्ग – मानों घन चिकुर में सेंदुर भरी माँग – यहाँ की मृत्तिका लाल होती है। मध्याह्न के उपरांत आखेट के लिए गए थे। 40 मनुष्यों ने मिलकर खेदा किया पर केवल एक शशक निकला सो भी हे शशांक-बदनी तुम्हारे नाम के प्रथमाक्षर सरीखा जान छोड़ दिया गया। आज का दिन अच्छा कटा सभी लोग डेरे में बैठे वनों की नाना कथा कह रहे हैं।
‘’मंगल 3 – आज मंगल ही मंगल है। लोग कहते हैं ‘जंगल में मंगल’ – सो ठीक हैं – यहीं पर होली का दंगल भी आज हुआ और इसी पीतवन में तुम्हारे प्रेमपत्र ने मुझै सनाथ किया। मैं आज कुछ और हूँ। मेरा शरीर और मन पीररहित हैं। मृगया के अनंतर मैं इस सर्ज के तरे बैठा हूँ। धीर समीर मेरे श्रम को मिटाती है – तुम्हारे शरीर को स्पर्श करके आती अवश्य होगी, तभी तो मेरे ही तल को शीतल करती है। तुम्हारी पाती ने आज जो मुझै आनंद दिया – ईश्वर ही साक्षी – सब व्यवस्था तो पूर्व पत्र में लिख ही चुके हैं।’’
‘’बुधवार 4 – आज पीतवन में डेरा है। आगे नहीं बढ़े।’’
‘’वृहस्पति 5 – पीतवन से आज चल के पुष्पडोल में डेरा हुआ, यहाँ कुल्लुक नाला सघन वन से निकला है। इसी के तट पर आज विकट कटक पड़ा। बनैले जंतुओं के भयानक रव का दव कैसा सुनाई पड़ता है। आधी रात में सब सून सान परा है केवल हूँमा की हुँकारी की झाँईं पर्वत के कंदरों में बोलती है।’’
‘’शुक्र 6 – आज भी पुष्पडोल में रहे काम बहुत था।’’
‘’शनिवार 7 – पुष्पडोल से रत्नशिला। यह शैलमय वनोद्देश ऐसा सघन और विचित्र है कि ऐसा मैंने इस प्रदेश में पूर्व नहीं देखा था। शार्दूल गज गवय भालू इत्यादि समूह के समूह इतस्ततः घूमते दिखाई देते हैं। यहाँ केवल पगडंडी राह है। मन चलता है कि विजन वन में एकांक हो केवल तुम्हारे ध्यान में मग्न हो बैठें।’’
‘’रविवार 8 – रत्नशिला से सरलपल्ली। इस पल्ली में केवल तीन घर हैं। दूध दही कुछ नहीं मिलता, वन का अंत भी दुर्लभ है। किसी प्रकार से निर्वाह कर लिया। यह दंडकारण्य का प्रदेश दर्शनीय है। हा देव हमारी श्यामा को क्यौं बिलग कर दिया।’’
सोमवार 9 – सरपल्ली से यमपुरी यह पुरी साक्षात् यम की पुरी है। यहाँ का जल बड़ा दुखःदाई और ज्वरादिक अनेक रोगों को उपजाता है। नागरिक लोग यहाँ आते ही यमसदन सिधारते हैं। हम लोग सहे वहे हैं। किसी प्रकार से दिन काट ही लेते हैं। यहाँ से निकट ही मतंगवाटी नाम की घाटी प्रसिद्ध है। इसकी उतरने की परिपाटी ऐसी दुस्तर और अटपटी है कि शाटी आदि बसन बदन पर नहीं रह सकते। यहाँ के वासी लाटी बोलते हैं। इस वन के बाँस की सांटी (सोंटा) प्रसिद्ध है। लोग बड़े कुपाटी – नट नटी से कूद कूद वन में विचरते रहते हैं। सुनते हैं कि यहाँ एक वृद्ध व्याघ्र बुद्धि का भरा किसी अन्य देश से आया है। यह ऐसा ढीठ है कि ग्राम के पशुओं को दिन थोसे धर खाता है।’’
‘’तुम्हारा केवल – बस – वही।’’
‘’यहाँ से चल श्यामसुंदर मान्यपुर की ओर मुड़े। मेरे लिखे अनुसार कंचनपुर के पंथ में पाँव भी न धरा। उन्हैं अब चटपटी पड़ी और मेरी सूरति की सूरत करते करते मग्न हो जाते। किसी प्रकार से दो दिन और गली में भली भाँति लगाए। पर इसका हेतु बिजली और मेह था। बदली छाई रहती। अकाल के मेघ दुर्दिन के सूचक थे। सुदिन के सूर्य ने अंत में वियोग तम फाड़ दिया। हंसमाल में आ पहुँचे। बसंत झलकी आम के मौर लगे जिन पर भौंर के डेरा जमे। धमार की मार होने लगी। सरसौं के खेत फूले – धान पकी – कोइल कुहकने लगी। जिधर देखो उधर उत्सव ही उत्सव था इस अवसर पर केवल श्यामसुंदर ने निरुत्सवता की समाधि लगा ली थी। आँख मूँद के मेरा ही ध्यान लगा लेते और यदि कोई बीच में बोलता तो – ‘’श्यामा-श्यामा’’ कह उठते, उन्हैं उनके एक प्राचीन प्रियतम का कवित्त बहुत प्यारा लगता और बार बार उसी को अकेले दुकेले कहते रहते।
आवत बसंत आली कंत के मिलाप बिनु मदन भभूकैं अंग अंग आन फूकैंगी। हरीचंद फूछैंगे पलाश कचनार वन त्रिविध समीर की झकोरैं चारु झूकैंगी॥ गावत बहार ह्वै है जीव को निकार आजु एक एक तन प्रान लेन को न चूकैंगी। करैगो कसाई काम वाम कतलाम बिना श्याम बैठि डार हाय कोइलैं कुहूकैंगी॥

