राम बान अन्ययाले तीर, जाहि लागे लागे सो जाँने पीर॥ टेक॥तन मन खोजौं चोट न पाँऊँ, ओषद मूली कहाँ घसि लाँऊँ॥एकही रूप दीसै सब नारी, नाँ जानौं को पियहि पियारी॥कहै कबीर जा मस्तिक भाग, नाँ जानूँ काहु देइ सुहाग॥118॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीरकविताहम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीर२ मिनट का पाठ