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राम बान अन्ययाले तीर, जाहि लागे लागे सो जाँने पीर

पद · लगभग २ मिनट
राम बान अन्ययाले तीर, जाहि लागे लागे सो जाँने पीर॥ टेक॥तन मन खोजौं चोट न पाँऊँ, ओषद मूली कहाँ घसि लाँऊँ॥एकही रूप दीसै सब नारी, नाँ जानौं को पियहि पियारी॥कहै कबीर जा मस्तिक भाग, नाँ जानूँ काहु देइ सुहाग॥118॥

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