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आस नहिं पूरिया रे, राम बिन को कर्म काटणहार

पद · लगभग २ मिनट
आस नहिं पूरिया रे, राम बिन को कर्म काटणहार॥ टेक॥जद सर जल परिपूरता, पात्रिग चितह उदास।मेरी विषम कर्म गति ह्नै परा, ताथैं पियास पियास॥सिध मिलै सुधि नाँ मिलै, मिलै मिलावै सोइ॥सूर सिध जब भेटिये, तब दुख न ब्यापै कोइ॥बौछैं जलि जैसें मछिका, उदर न भरई नीर॥त्यूँ तुम्ह कारनि केसवा, जन ताला बेली कबीर॥119॥

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