भान की तपन बन उपबन जारै लागी,तैसी तेज लूयें लोल लागें ज्वाल जाला सी।ताल नदी नालन के नीर तैं रंधन लागे,तातें लाल सुनहु उपाय एक आला सी॥ग्वाल कवि प्यारी की छबीली छाती छाँह छिप्यौ,चंदन सी हांसी देह चंदन रसाला सी।पाला सी बिलोकन हिवाला सी लपट जाकी,लीजै चलि कंठ मेलि मालती की माला सी॥

