चमचम चाँदनी की चमक चमकि रही,राखी है उतारि करि चंद्रमा चरख तें।अंबर-अवनि-अंबु-आलय-विटप-गिरि,एक ही से पेखे, परैं बनैं न परख तें।‘ग्वाल’ कवि कहै दसों दिसा ह्वै गईं सफ़ेद,खेद को रह्यो न भेद, फूली है हरख तें।लीपी अबरख तें, कि टीपी पुंज पारद तें,कैधों दुति दीपीं चारु चाँदी के बरख तें॥

चमचम चाँदनी की चमक चमकि रही
ग्वालकवित्त · लगभग २ मिनट