ऐसे देखि चरित मन मोह्यौ मोर, ताथैं निस बासुरि गुन रमौं तोर॥ टेक॥इक पढ़हिं पाठ इक भ्रमें उदास इक नगन निरंतर रहै निवास॥इक जोग जुगति तन हूंहिं खीन, ऐसे राम नाम संगि रहै न लीन॥इक हूंहि दीन एक देहि दांन, इक करै कलापी सुरा पांन॥इक तंत मंत ओषध बांन, इक सकल सिध राखै अपांन॥इक तीर्थ ब्रत करि काया जीति, ऐसै राम नाम सूँ करै न प्रीति॥इक धोम धोटि तन हूंहिं स्यान, यूँ मुकति नहीं बिन राम नाम॥सत गुर तत कह्यौ बिचार, मूल गह्यौ अनभै बिसतार॥जुरा मरण थैं भये धीर, राम कृपा भई कहि कबीर॥386॥

