सब मदिमाते कोई न जाग, ताथे संग ही चोर घर मुसन लाग॥पंडित माते पढ़ि पुरांन, जोगी माते धरि धियांन॥संन्यासी माते अहंमेव, तपा जु माते तप के भेव॥जागे सुक ऊधव अंकूर, हणवंत जागे ले लंगूर॥संकर जागे चरन सेव, कलि जागे नांमां जेदेव॥ए अभिमान सब मन के कांम, ए अभिमांन नहीं रही ठाम॥आतमां रांम कौ मन विश्राम, कहि कबीर भजि राम नाम॥387॥

