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हाशिया
कविता
संकल ही तै सब लहै, माया इहि संसार
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
संकल ही तै सब लहै, माया इहि संसार।
ते क्यूँ छूटैं बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥२५॥
॥
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विरहा वुरहा जनि कहौ,बिहरा है सुलितान
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संसै खाया सक्ल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध
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कबीर
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