कबीरा संत नदी गया बहि रे,ठाढ़ी माइ कराड़े टेरै, है कोई ल्यावैगहि रे॥ टेक॥बादल बाँनी राम घन उनयाँ, बरिषै अमृत धारा॥सखी नीर गंग भरि आई, पीवै प्राँन हमारा॥जहाँ बहि लागे सनक सनंदन, रुद्र ध्याँन धरि बैठे॥सूर्य प्रकास आनंद बमेक मैं घर कबीर ह्नै पैठे॥151॥

कबीरा संत नदी गया बहि रे
कबीरपद · लगभग २ मिनट