मधुकर! करिवे में कहा राखी।लोक बेद की कान तजी हम, लाज सकल कुल नाखी॥भाँति-भाँति हम भाव उघारे, बहुत दीनता भाखी।यों लगि रहीं स्याम के चरनन, ज्यों गुर लागी माखी॥बहुत जतन करि एक बेर हम, अधर सुधा कछु चाखी।अब उहँ ताप सकल अंग व्यापौ, चिंता चित्त भई साखी॥यह कछु नहीं प्रीति गोबिंद की, अवलोकत मन साखी।‘रसिक’ वियोग बयौ हम ही कों, भये कुबरी कर पाखी॥

मधुकर! करिवे में कहा राखी
गोस्वामी हरिरायपद · लगभग २ मिनट