ऊधौ! छाँड़ियै हरि बात।हमहिं लीला दै सिधारै, आपु मथुरा जात॥तजत बे सुध भए यह मन, बिरह दुख न समात।चलत क्यों नहीं रोकि राख गोबिंद, अति पछितात॥हरि की लीला ठौर देखत, जुगल दृग न सुखात।बिरह सुधि नई तुम दई करि, तातें बहौत दुखात॥द्रुम-लता-गिरि फिरत हारी, बूझि-बूझि संकात।‘रसिक प्रीतम’ दूरि ही भले, मिलन सुख अकुलात॥

ऊधौ! छाँड़ियै हरि बात
गोस्वामी हरिरायपद · लगभग २ मिनट