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चाहिये ज़रूर इनसानियत मानस को

कवित्त · लगभग २ मिनट
चाहिये ज़रूर इनसानियत मानस को,नौबत बजे पै फेरि भेर बजनो कहा।जात औ अजात कहा हिन्दु औ मुसलमान,जासों करी प्रीति तासों फेरि भजनो कहा॥ग्वाल कवि जा के लिये सीस पै बुराई लई,लाज हू गमाई तासों फेरि लजनो कहा।केतो काहू रंग में न रँगियो सुजान प्यारे,रंगे तो रँगेई रहो फेरि तजनो कहा॥

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