कहा भयौ तिलक गरै जपमाला, मरम न जानैं मिलन गोपाला॥ टेक॥दिन प्रति पसू करै हरिहाई, गरैं काठ बाकी बाँनि न जाई।स्वाँग सेत करणी मनि काली, कहा भयौ गलि माला घाली॥बिन ही प्रेम कहा भयौ रोये, भीतरि मैल बाहरि का धोये॥गल गल स्वाद भगति नहीं धीर, चीकन चंदवा कहै कबीर॥136॥

